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सपा पार्षद को शपथ न दिलाना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने लखनऊ मेयर के सभी अधिकार किए फ्रीज
लखनऊ, 22 मई 2026.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की राजनीति और नगर निगम प्रशासन में उस समय बड़ा भूचाल आ गया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भाजपा की मेयर के सभी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तत्काल प्रभाव से फ्रीज करने का आदेश दे दिया। अदालत ने यह सख्त कदम समाजवादी पार्टी के निर्वाचित पार्षद को पांच महीने बीत जाने के बाद भी शपथ न दिलाए जाने पर उठाया है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस और जस्टिस शामिल थे, ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक निर्वाचित सपा पार्षद को विधिवत शपथ नहीं दिलाई जाती, तब तक मेयर किसी भी प्रकार के प्रशासनिक या वित्तीय अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगी। अदालत ने नगर निगम के संचालन की जिम्मेदारी जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को सौंप दी है।
इस फैसले के बाद मेयर अब अपने फंड से किसी प्रकार का खर्च नहीं कर सकेंगी, न ही किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई कर पाएंगी। अदालत के इस आदेश को स्थानीय निकाय प्रशासन में बेहद असाधारण और कड़ा कदम माना जा रहा है।
पूरा मामला लखनऊ नगर निगम के वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज से जुड़ा है। नगरीय निकाय चुनाव 2023 में भाजपा प्रत्याशी और सपा प्रत्याशी ललित तिवारी के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। मतगणना में प्रदीप शुक्ला को 4,972 वोट मिले थे, जबकि ललित तिवारी को 3,298 मत प्राप्त हुए थे। इसके आधार पर भाजपा प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया था।
हालांकि चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद 13 मई 2023 को ललित तिवारी ने अपर जिला जज की अदालत में चुनाव याचिका दायर कर भाजपा प्रत्याशी के निर्वाचन को चुनौती दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि नामांकन दाखिल करते समय प्रदीप कुमार शुक्ला ने निर्वाचन प्रपत्रों में कई आवश्यक जानकारियां छिपाई थीं और कुछ अनिवार्य सूचनाएं नहीं दी थीं, जो कानूनन देना जरूरी था।
याचिका में कहा गया था कि यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि चुनावी नियमों का गंभीर उल्लंघन और कदाचार की श्रेणी में आने वाला मामला है। अदालत में चुनावी हलफनामों, एफिडेविट और अन्य दस्तावेजों की लंबी सुनवाई चली। करीब ढाई वर्ष तक चले इस कानूनी संघर्ष के बाद 19 दिसंबर 2025 को निर्वाचन न्यायाधिकरण ने भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया और ललित तिवारी को वार्ड-73 से विधिवत निर्वाचित घोषित कर दिया।
लेकिन अदालत के आदेश के बावजूद पांच महीने तक उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। आरोप है कि नगर निगम प्रशासन लगातार टालमटोल करता रहा और इस दौरान भाजपा के प्रदीप कुमार शुक्ला पार्षद के रूप में कार्य करते रहे।
इसके बाद ललित तिवारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि जिलाधिकारी ने 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को निर्वाचन न्यायाधिकरण के फैसले की जानकारी देते हुए धारा-85 के तहत शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी कराने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार की ओर से भी 4 फरवरी 2026 को इस संबंध में कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए थे।
इसके बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 12 मई 2026 को एक सप्ताह के भीतर शपथ दिलाने का आदेश दिया था। इसी बीच भाजपा नेता प्रदीप कुमार शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन वहां से भी राहत नहीं मिली और याचिका खारिज कर दी गई।
इसके बाद भी जब शपथ ग्रहण नहीं कराया गया, तब हाईकोर्ट ने इसे न्यायालय के आदेशों की अवहेलना मानते हुए लखनऊ मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया। गुरुवार को हुई सुनवाई में अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए मेयर के अधिकार फ्रीज करने का ऐतिहासिक आदेश जारी कर दिया।
राजनीतिक गलियारों में इस फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। समाजवादी पार्टी इसे लोकतंत्र और न्यायपालिका की जीत बता रही है, जबकि भाजपा खेमे में इस फैसले को लेकर हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मामला प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
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