सिर्फ ‘चमार’ शब्द बोलना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं, अपमान की मंशा साबित करना जरूरी-हाईकोर्ट…….

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ‘चमार’ शब्द बोलना SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं, अपमान की मंशा साबित करना जरूरी

प्रयागराज | 20 अगस्त 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act के तहत जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के लिए केवल ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल कर देना अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह भी दिखाना जरूरी है कि उस शब्द का इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या नीचा दिखाने की मंशा या जानकारी के साथ किया गया था।

यह फैसला न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने Vegraj Singh and Another बनाम State of U.P. and Another मामले में सुनाया। हाईकोर्ट ने बरेली की विशेष अदालत द्वारा मुख्य आरोपी के पिता और बड़े भाई को मुकदमे में आरोपी के तौर पर समन किए जाने का आदेश रद्द कर दिया। मामला आपराधिक अपील संख्या 4882/2025 से संबंधित है और हाईकोर्ट का फैसला 13 अगस्त 2026 का है।

क्या था पूरा मामला?

मामला बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र का है। पुलिस के पास दर्ज FIR में मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के अलावा उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत के नाम भी शामिल थे। FIR में भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n), 504 और 506 के साथ SC/ST एक्ट की धाराएं 3(2)(5A), 3(2)(r) और 3(2)(s) लगाई गई थीं।

जांच पूरी होने के बाद विवेचक ने मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि उसके पिता वेगराज और भाई दौलत के खिलाफ पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने पर उन्हें जांच में आरोपमुक्त कर दिया गया।

मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचने के बाद पीड़िता ने अपने बयान में दोनों के खिलाफ भी कथित गाली-गलौज और ‘चमार’ शब्द के इस्तेमाल की बात कही। इसके आधार पर स्पेशल जज (SC/ST एक्ट), बरेली ने 21 मार्च 2025 को दोनों को मुकदमे में समन कर दिया। इसी आदेश को दोनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया समन आदेश?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि जांच के दौरान पीड़िता के धारा 161 और 164 CrPC के बयानों में दोनों आरोपियों के खिलाफ कोई स्पष्ट और अलग भूमिका नहीं बताई गई थी। विशेष रूप से कथित जातिसूचक टिप्पणी के संबंध में भी दोनों के खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका दर्ज नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि केवल ट्रायल के दौरान दिए गए बयान के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को आरोपी के तौर पर समन करना उचित नहीं है, जिसके खिलाफ जांच में पर्याप्त सामग्री नहीं मिली हो। धारा 319 CrPC के तहत किसी अतिरिक्त व्यक्ति को आरोपी बनाने की शक्ति असाधारण प्रकृति की है और इसका इस्तेमाल सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।

‘चमार’ शब्द को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने साफ किया कि किसी जाति के नाम का इस्तेमाल हर परिस्थिति में SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि यह देखने के लिए परिस्थितियां महत्वपूर्ण हैं कि शब्द किस संदर्भ में, किस उद्देश्य से और किस मंशा से बोला गया।

न्यायमूर्ति संतोष राय ने अपने फैसले में कहा कि केवल ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल अपने आप यह साबित नहीं करता कि आरोपी ने पीड़िता को उसकी SC/ST पहचान के कारण अपमानित या नीचा दिखाने के इरादे अथवा जानकारी के साथ वह शब्द इस्तेमाल किया था।

अदालत ने Swaran Singh बनाम State और Hitesh Verma बनाम State of Uttarakhand जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों के सिद्धांत के अनुसार SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के लिए केवल गाली-गलौज या झगड़ा पर्याप्त नहीं है; आरोप में जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान या धमकाने का आवश्यक तत्व भी होना चाहिए।

SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) क्या कहती हैं?

इस मामले में SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) महत्वपूर्ण थीं। इन प्रावधानों के तहत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को उसकी जातिगत पहचान के आधार पर जानबूझकर अपमानित या भयभीत करना तथा जातिसूचक शब्दों के जरिए सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अपराध हो सकता है।

इसलिए हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि जातिसूचक गाली देना अपराध नहीं है। यदि परिस्थितियों और साक्ष्यों से यह साबित होता है कि शब्द का इस्तेमाल SC/ST समुदाय के व्यक्ति को उसकी जाति के कारण अपमानित या नीचा दिखाने के उद्देश्य से किया गया था, तो SC/ST एक्ट की धाराएं लागू हो सकती हैं। फैसले में इसी इरादे और आवश्यक कानूनी तत्वों के प्रमाण को महत्वपूर्ण माना गया है।

धारा 319 CrPC को लेकर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने Hardeep Singh बनाम State of Punjab के संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 319 CrPC के तहत किसी व्यक्ति को आरोपी के रूप में जोड़ने की शक्ति का इस्तेमाल सामान्य तरीके से नहीं किया जा सकता। इसके लिए रिकॉर्ड पर ऐसा विश्वसनीय और मजबूत साक्ष्य होना चाहिए, जिससे संबंधित व्यक्ति की संलिप्तता स्पष्ट रूप से सामने आती हो।

अदालत ने पाया कि वेगराज और दौलत के खिलाफ ऐसा कोई पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था, जो उन्हें मुख्य आरोपी के साथ कथित अपराध में पर्याप्त रूप से जोड़ता हो। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दोनों को समन करना कानून की कसौटी पर सही नहीं पाया गया।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 21 मार्च 2025 को विशेष अदालत, बरेली द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया और वेगराज सिंह तथा दौलत की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री से उनके खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत आवश्यक प्रथमदृष्टया तत्व स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते थे।

फैसले का सीधा मतलब

इस फैसले को इस रूप में समझना सही होगा कि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल और SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित होना दो अलग बातें हैं। अदालत को यह देखना होगा कि शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में हुआ, क्या आरोपी की मंशा जाति के आधार पर पीड़ित को अपमानित करना थी और क्या उसके समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद हैं।

इसलिए यह फैसला जातिसूचक अपमान को वैध नहीं ठहराता, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि SC/ST एक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों और आरोपी की भूमिका का ठोस आधार होना जरूरी है।

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