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40 साल तक फरारी, फिर 73 की उम्र में जेल—पुराने अपराध ने आखिरकार पकड़ लिया रास्ता
हैदराबाद, 27 अगस्त 2026।
करीब चार दशक तक कानून की पकड़ से बाहर रहा हत्या का दोषी आखिरकार 73 साल की उम्र में दोबारा जेल पहुंच गया। 1983 में उम्रकैद की सजा पाने के बाद पैरोल पर बाहर आया यह व्यक्ति तय समय पर जेल नहीं लौटा और करीब 40 वर्षों तक सामान्य जीवन जीता रहा। इस दौरान उसने सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी भी की और सेवानिवृत्त हो गया।
मामला तेलंगाना हाईकोर्ट के सामने तब आया, जब दोषी की 73 वर्षीय पत्नी ने याचिका दाखिल कर अपने पति को राहत देने की मांग की। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की निगरानी व्यवस्था को लेकर जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए।
1983 में मिली थी उम्रकैद
मामला दिसंबर 1983 का है। हत्या और दंगे के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को उम्रकैद की सजा हुई थी। जेल में सजा काटने के दौरान उसे 30 दिनों की पैरोल मिली। बाद में पैरोल की अवधि बढ़ाकर मार्च 1984 तक कर दी गई थी। उसे 18 मार्च 1984 को जेल वापस लौटना था, लेकिन वह वापस नहीं आया।
इसके बाद वह फरार हो गया और लंबे समय तक उसकी कोई खबर नहीं मिली।
फरारी के दौरान बन गया सरकारी शिक्षक
हैरानी की बात यह रही कि फरार होने के बाद उसने अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ाई। उसने सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी की। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2004 में उसे ‘बेस्ट टीचर’ पुरस्कार भी मिला और वर्ष 2013 में वह सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो गया।
करीब चार दशक बाद पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने उसे 16 मई 2024 को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसे दोबारा जेल भेज दिया गया।
पत्नी ने मांगी राहत, हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
दोषी की पत्नी ने तेलंगाना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपने पति की रिहाई की मांग की। हालांकि अदालत ने राहत देने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने इस मामले में इस बात पर भी चिंता जताई कि एक उम्रकैद का कैदी पैरोल से फरार होकर करीब 40 वर्षों तक प्रशासन की निगरानी से बाहर कैसे रहा। कोर्ट ने पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और ऐसे कैदियों की प्रभावी ट्रैकिंग के लिए जरूरी कदम उठाने पर जोर दिया।
यह मामला सिर्फ एक दोषी के चार दशक बाद जेल लौटने की कहानी नहीं है, बल्कि जेल और पैरोल निगरानी व्यवस्था में हुई गंभीर चूक पर भी सवाल खड़े करता है। उम्र बढ़ने और लंबे समय तक सामान्य जीवन जी लेने के बावजूद पुराना अपराध कानूनी रूप से खत्म नहीं हुआ—और आखिरकार 73 वर्ष की उम्र में उसे फिर सलाखों के पीछे जाना पड़ा।
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