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ना कानूनी दाँवपेच -ना कोई लफड़ा

‘क्वाइट डिवोर्स’: खामोशी में खत्म होते रिश्ते और बदलता सामाजिक नजरिया
नई दिल्ली, 28 जनवरी 2026.
क्या रिश्ते बिना शोर, बिना लड़ाई और बिना कानूनी लड़ाई के भी खत्म हो सकते हैं? बदलते समय में इसका जवाब तेजी से ‘हां’ की ओर जा रहा है।
समाज में रिश्तों को निभाने का नजरिया अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी ‘लोग क्या कहेंगे’ के दबाव में लोग जीवनभर बेमन से रिश्ते ढोते थे, लेकिन अब मानसिक शांति और व्यक्तिगत खुशी को प्राथमिकता देने का चलन बढ़ा है। इसी बदलाव के बीच रिश्तों को खत्म करने का एक नया और अपेक्षाकृत आधुनिक तरीका चर्चा में है, जिसे ‘क्वाइट डिवोर्स’ या ‘साइलेंट डिवोर्स’ कहा जा रहा है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, क्वाइट डिवोर्स दरअसल एक सामाजिक और भावनात्मक स्थिति है, न कि कानूनी प्रक्रिया। इसमें पति-पत्नी कागजों पर तो शादीशुदा रहते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हो चुके होते हैं। वे एक ही घर में रहते हैं, लेकिन पति-पत्नी की तरह नहीं, बल्कि रूममेट्स की तरह। न रिश्ते में प्यार बचता है, न झगड़े होते हैं। दोनों अपनी-अपनी दुनिया में सीमित रहते हैं और बातचीत सिर्फ जरूरी कामों तक सिमट जाती है।
इस मामले में मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह स्थिति अचानक नहीं बनती, बल्कि लंबे समय तक भावनात्मक दूरी, संवाद की कमी और रिश्ते में ठहराव के बाद पैदा होती है। कई मामलों में दंपति एक-दूसरे से उम्मीद करना ही छोड़ देते हैं और धीरे-धीरे रिश्ता खामोशी में खत्म हो जाता है।
क्वाइट डिवोर्स को चुनने के पीछे कई व्यावहारिक कारण सामने आ रहे हैं। कानूनी तलाक की प्रक्रिया लंबी, खर्चीली और मानसिक रूप से थकाने वाली मानी जाती है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर, वकीलों की फीस और संपत्ति के बंटवारे से बचने के लिए कई लोग इस रास्ते को आसान मानते हैं। इसके अलावा बच्चों की वजह से भी कई दंपति औपचारिक तलाक से बचते हैं, ताकि बच्चों पर माता-पिता के अलगाव का सीधा असर न पड़े।
साइलेंट डिवोर्स चुनने का एक कारण आर्थिक मजबूरियां, जैसे लोन, ईएमआई और घरेलू खर्च, भी लोगों को एक ही छत के नीचे रहने के लिए मजबूर करती हैं।
बहुत लोग इसे रोज-रोज के झगड़ों की तुलना में बेहतर समझौता मानते हैं। उनका मानना है कि अगर रिश्ता चल नहीं रहा, तो कम से कम शांति के साथ अलग-अलग जिंदगी जीना बेहतर है। इस व्यवस्था में समाज और रिश्तेदारों के सामने सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, जिससे सवालों और दबावों से बचाव हो जाता है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि क्वाइट डिवोर्स के कुछ फायदे दिखने के बावजूद इसके नकारात्मक पहलू भी कम नहीं हैं। लंबे समय तक भावनात्मक दूरी में रहना मानसिक तनाव, अकेलेपन और अवसाद को जन्म दे सकता है। बच्चे भले ही माता-पिता को एक साथ देखते हों, लेकिन घर के भीतर के भावनात्मक माहौल को वे महसूस करते हैं, जिसका असर उनके मानसिक विकास पर पड़ सकता है।
अक्सर ‘क्वाइट डिवोर्स’ और ‘प्राइवेट डिवोर्स’ को एक जैसा समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर है। क्वाइट डिवोर्स में कोई कानूनी तलाक नहीं होता। दंपति कानूनन पति-पत्नी रहते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से रिश्ता खत्म हो चुका होता है। वहीं प्राइवेट डिवोर्स पूरी तरह कानूनी तलाक होता है, बस इसे बेहद गोपनीय तरीके से, बिना सार्वजनिक चर्चा और विवाद के निपटाया जाता है।
समाजशास्त्रियों का कहना है कि क्वाइट डिवोर्स दरअसल बदलते सामाजिक मूल्यों और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का संकेत है। यह दिखाता है कि आज के दौर में लोग रिश्तों को निभाने से ज्यादा अपने मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को महत्व देने लगे हैं। हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस स्थिति में पहुंचने से पहले संवाद, काउंसलिंग और आपसी समझ की कोशिश जरूर की जानी चाहिए, ताकि फैसला जल्दबाजी में न हो।
कुल मिलाकर, ‘क्वाइट डिवोर्स’ आधुनिक समाज की एक नई सच्चाई बनकर उभर रहा है, जो रिश्तों की परिभाषा और उनके अंत के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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👉लेख विभिन्न स्रोतों से आधारित
