धान की फसल:नर्सरी से लेकर रोपाई तक, अभी उठाया गया सही कदम बढ़ा सकता है किसानों की आमदनी…….

Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

धान की खेती का बिगुल बजा: नर्सरी से लेकर रोपाई तक, अभी उठाया गया सही कदम बढ़ा सकता है किसानों की आमदनी

लखनऊ, 31 मई 2026 — उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत में धान की खेती का मौसम शुरू हो चुका है। खेतों में ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट सुनाई देने लगी है और किसान खरीफ की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान की तैयारी में जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि धान की खेती में सफलता की नींव नर्सरी से ही पड़ती है। यदि किसान समय पर नर्सरी तैयार कर लें और खेत की वैज्ञानिक ढंग से तैयारी करें तो उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की जा सकती है।

मई के अंतिम सप्ताह और जून के पहले पखवाड़े को धान की नर्सरी डालने का सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार नर्सरी के लिए स्वस्थ, प्रमाणित और रोगमुक्त बीजों का चयन करना चाहिए। बीजों का उपचार करने से फफूंद और अन्य बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाता है। मजबूत और स्वस्थ पौधे ही आगे चलकर अधिक बालियां और बेहतर उत्पादन देने में सक्षम होते हैं।

धान की अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि किसान पहली बारिश के बाद खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बनाएं। इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल करें ताकि पानी का समान वितरण हो सके। खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद या जैविक खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों को शुरुआती पोषण मिलता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की खेती में पानी का सही प्रबंधन सफलता की कुंजी है। खेत में जरूरत से ज्यादा पानी भर जाने या लंबे समय तक सूखे की स्थिति बनने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए किसानों को मौसम विभाग की सलाह और मानसून की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रखनी चाहिए।

कृषि विभाग के अनुसार 21 से 25 दिन की स्वस्थ पौध रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। समय पर तैयार पौध मानसून की शुरुआती बारिश के साथ खेतों में रोपी जा सकती है, जिससे फसल को पर्याप्त बढ़वार का समय मिलता है और उत्पादन बेहतर होता है।

विशेषज्ञों ने किसानों को आगाह किया है कि जल्दबाजी में बिना तैयारी के बुआई या रोपाई करने से नुकसान हो सकता है। प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक, समय पर नर्सरी और वैज्ञानिक तरीके से खेत की तैयारी किसानों को अधिक उपज और बेहतर मुनाफा दिला सकती है।

इस समय गांवों में धान की खेती को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। कृषि विभाग भी किसानों को जागरूक करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चला रहा है। ऐसे में किसान यदि आधुनिक कृषि तकनीकों और विशेषज्ञों की सलाह का पालन करें तो इस खरीफ सीजन में धान की फसल बेहतर उत्पादन का नया रिकॉर्ड बना सकती है।

धान की खेती का बिगुल बजा: नर्सरी से लेकर रोपाई तक, जानिए कौन-सी धान की किस्म दे सकती है अधिक उत्पादन

कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को कुछ उन्नत और लोकप्रिय धान की किस्मों को अपनाने की सलाह दी जा रही है।

पीआर-126 (PR-126) कम अवधि में तैयार होने वाली प्रमुख किस्म है। यह लगभग 120 से 125 दिनों में पक जाती है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें पानी की खपत कम होती है और उत्पादन अच्छा मिलता है। जल्दी पकने के कारण अगली फसल की बुवाई के लिए भी पर्याप्त समय मिल जाता है।

सारजू-52 (Sarju-52) पूर्वी उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्रों के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। यह किस्म रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती है तथा 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है।

पूसा बासमती-1509 (Pusa Basmati-1509) सुगंधित धान की उन्नत किस्मों में शामिल है। यह जल्दी तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है। निर्यात के लिए भी इसे पसंद किया जाता है, जिससे किसानों को बेहतर कीमत मिल सकती है।

एचडीआर-77 (HDR-77) उत्तर प्रदेश के कई जिलों में किसानों द्वारा अपनाई जा रही उन्नत किस्म है। यह अच्छी गुणवत्ता के दाने देती है और अनुकूल परिस्थितियों में बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है।

स्वर्णा (MTU-7029) देश की सबसे लोकप्रिय धान किस्मों में से एक है। यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है तथा इसकी फसल अपेक्षाकृत स्थिर मानी जाती है। लंबे समय से किसान इस किस्म पर भरोसा करते आ रहे हैं।

पूसा-44 (Pusa-44) अधिक उत्पादन देने वाली किस्म मानी जाती है, लेकिन इसमें पानी की आवश्यकता अपेक्षाकृत अधिक होती है। जहां सिंचाई की बेहतर व्यवस्था हो, वहां यह किसानों को अच्छा लाभ दे सकती है।

धान की उन्नत किस्म 5204 (Samba Mahsuri-5204) किसानों के बीच तेजी से बन रही पसंद

धान की 5204 किस्म (कई क्षेत्रों में सांबा मह्सूरी-5204 के नाम से प्रचलित) अपनी बेहतर गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधक क्षमता और अच्छे उत्पादन के कारण किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यह किस्म विशेष रूप से उन किसानों के लिए लाभदायक मानी जाती है जो उत्पादन के साथ-साथ बाजार में अच्छी कीमत भी चाहते हैं।

मुख्य विशेषताएं

अवधि: लगभग 130 से 140 दिन में तैयार।

उत्पादन क्षमता: 55 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक, उचित प्रबंधन पर इससे अधिक उत्पादन भी संभव।

दाने की गुणवत्ता: लंबे, पतले और चमकदार दाने, जिससे बाजार में अच्छी मांग रहती है।

खाने की गुणवत्ता: चावल पकने के बाद स्वादिष्ट और मुलायम होता है, इसलिए उपभोक्ताओं की पसंदीदा किस्मों में शामिल।

रोग प्रतिरोधक क्षमता: ब्लास्ट और कुछ अन्य प्रमुख रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील।

गिरने की समस्या कम: पौधे मजबूत होने के कारण तेज हवा और बारिश में फसल गिरने की संभावना कम रहती है।

बाजार भाव बेहतर: सामान्य धान की तुलना में कई क्षेत्रों में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना।

किस क्षेत्र के लिए उपयुक्त

यह किस्म पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और दक्षिण भारत के कई राज्यों में अच्छी पैदावार देती है। जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था हो, वहां इसका प्रदर्शन और बेहतर माना जाता है।

बीज दर

एक हेक्टेयर रोपाई के लिए लगभग 20 से 25 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है।

किसानों के लिए सलाह

विशेषज्ञों का कहना है कि 5204 किस्म की नर्सरी जून के प्रथम पखवाड़े में तैयार कर 22 से 25 दिन की पौध की रोपाई करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं। खेत में संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय-समय पर खरपतवार नियंत्रण करने से उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

धान की उन्नत किस्मों में यदि किसान पीआर-126, सारजू-52, पूसा बासमती-1509 और 5204 जैसी किस्मों का चयन स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार करें तो इस खरीफ सीजन में बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि बीज खरीदते समय केवल प्रमाणित और सरकारी संस्थानों अथवा अधिकृत विक्रेताओं से उपलब्ध बीज ही खरीदें। बीज उपचार के बाद ही नर्सरी में बोआई करें ताकि फसल को शुरुआती रोगों से बचाया जा सके।

धान की अच्छी पैदावार के लिए खेत की गहरी जुताई, समतलीकरण, जैविक खाद का प्रयोग और संतुलित उर्वरक प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है जितना कि अच्छी किस्म का चयन। समय पर की गई तैयारी और वैज्ञानिक खेती किसानों की लागत घटाने के साथ उनकी आमदनी बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती है।

खरीफ सीजन के इस महत्वपूर्ण दौर में कृषि विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान जल्दबाजी के बजाय योजना बनाकर खेती करें और अपने क्षेत्र के कृषि विभाग से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त किस्मों की जानकारी अवश्य प्राप्त करें।

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