Gyan Prakash Dubey

धरती तप रही है, अब भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी: यूरोप की त्रासदी भारत के लिए एक बड़ी चेतावनी
विशेष लेख | NGV PRAKASH NEWS
एक समय था जब लोग कहते थे कि मौसम बदल रहा है, लेकिन अब यह कहना पर्याप्त नहीं है। आज पूरी दुनिया महसूस कर रही है कि मौसम नहीं, बल्कि पूरी जलवायु बदल रही है। हर साल तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है, नदियां सूख रही हैं, जंगलों में आग लग रही है और शहर गर्म तवे की तरह तप रहे हैं। यह केवल विज्ञान की किताबों की बात नहीं रह गई है, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।
आज यूरोप, जिसे दुनिया के सबसे विकसित क्षेत्रों में गिना जाता है, भीषण गर्मी के सामने बेबस नजर आ रहा है। जिन देशों की मजबूत अर्थव्यवस्था, आधुनिक तकनीक और बेहतरीन बुनियादी ढांचे की मिसाल दी जाती थी, वहां आज गर्मी ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। यह केवल यूरोप की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है। भारत जैसे देश के लिए यह एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि अभी भी पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले वर्षों में हालात और भी भयावह हो सकते हैं।
इन दिनों पश्चिमी यूरोप अभूतपूर्व हीटवेव की चपेट में है। फ्रांस, स्पेन, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में तापमान ने कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस भीषण गर्मी का असर केवल लोगों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि रेलवे, बिजली व्यवस्था, उद्योग, कृषि और अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुका है।
फ्रांस में स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि कई परमाणु बिजलीघरों के रिएक्टरों को बंद करना पड़ा या उनकी उत्पादन क्षमता कम करनी पड़ी। कारण यह था कि ये संयंत्र नदियों के पानी का उपयोग करते हैं और अत्यधिक गर्म पानी वापस नदी में छोड़ने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ गई थी। बिजली उत्पादन प्रभावित होने का असर हजारों परिवारों और उद्योगों पर पड़ा।
रेलवे नेटवर्क भी गर्मी के आगे कमजोर साबित हुआ। जर्मनी, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड और फ्रांस में कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा, क्योंकि अत्यधिक तापमान से रेल पटरियों और ट्रेनों के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर असर पड़ा। कई जगह यात्रियों को घंटों तक स्टेशनों पर इंतजार करना पड़ा।
फ्रांस के एक बड़े ऑटोमोबाइल संयंत्र में मजदूरों ने फैक्ट्री के अंदर असहनीय गर्मी का हवाला देते हुए हड़ताल कर दी। मजदूरों का कहना था कि इतनी गर्म परिस्थितियों में काम करना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव लगातार बढ़ रहा है। फ्रांस की स्वास्थ्य मंत्री स्टीफेनी रिस्ट के अनुसार भीषण गर्मी के कारण कार्डियक अरेस्ट के मामलों में चार गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां प्रतिदिन 5 से 10 मामले सामने आते थे, वहीं अब यह संख्या 20 से 30 तक पहुंच गई है। वर्ष 2023 के कई वैज्ञानिक अध्ययनों में भी यह सामने आया कि फ्रांस, स्पेन और इटली जैसे देशों में हीटवेव के दौरान मृत्यु दर में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
यूरोप के शहरों की एक और बड़ी समस्या उनकी पुरानी इमारतें हैं। मोटी पत्थर और कंक्रीट की दीवारें दिनभर सूरज की गर्मी को अपने भीतर जमा करती रहती हैं और रातभर धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं। परिणामस्वरूप रात के समय भी घर भट्ठी की तरह गर्म बने रहते हैं। कई परिवारों के लिए घरों में रहना मुश्किल हो गया है। लोग आधी रात के बाद पार्कों में जाकर बैठ रहे हैं, होटल बुक कर रहे हैं और एयर कंडीशनर खरीदने की होड़ लगी हुई है।
जर्मन इंश्योरेंस कंपनी अलायंज की रिपोर्ट के अनुसार इटली, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन को भीषण गर्मी के कारण भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उद्योगों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो यूरोप की आर्थिक विकास दर पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
हालात इतने चिंताजनक हो गए हैं कि फ्रांस सरकार ने गर्मी से निपटने के लिए 52 उपायों वाली लगभग 388 पृष्ठों की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। वहीं लंदन में भी अत्यधिक गर्मी से लोगों की सुरक्षा के लिए विशेष हीट एक्शन प्लान लागू किया जा रहा है।
अब प्रश्न यह है कि क्या भारत सुरक्षित है?
उत्तर है—बिल्कुल नहीं।
भारत पहले ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को महसूस कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिमी भारत में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। कई राज्यों में 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुंच चुका है। शहरों में कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं, जबकि पेड़ों की संख्या लगातार घट रही है। तालाब, पोखर और छोटे जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। भूजल स्तर नीचे जा रहा है और प्राकृतिक हरियाली सिकुड़ती जा रही है।
यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में भारत के सामने भी वही संकट खड़ा हो सकता है, जिसका सामना आज यूरोप कर रहा है। बिजली की मांग कई गुना बढ़ेगी, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा, खेती प्रभावित होगी, जल संकट गहराएगा और आम लोगों का जीवन कठिन होता जाएगा।
यह सोच लेना कि केवल सरकार ही इस समस्या का समाधान कर देगी, पर्याप्त नहीं है। सरकारें नीतियां बना सकती हैं, अभियान चला सकती हैं, लेकिन धरती को हरा-भरा बनाने की जिम्मेदारी समाज और प्रत्येक नागरिक की भी है।
यदि प्रत्येक परिवार हर वर्ष कम से कम दो से पांच छायादार पौधे लगाए और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी स्वयं ले, तो कुछ वर्षों में करोड़ों नए वृक्ष तैयार हो सकते हैं। पीपल, बरगद, नीम, पाकड़, अर्जुन, शीशम, आम, जामुन जैसे बड़े वृक्ष केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि स्थानीय तापमान कम करने, वर्षा चक्र को संतुलित रखने, भूजल संरक्षण और जैव विविधता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हमें केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें जीवित रखना भी उतना ही आवश्यक है। वर्षा जल संचयन, तालाबों का संरक्षण, अनावश्यक पेड़ों की कटाई रोकना, प्लास्टिक का कम उपयोग, ऊर्जा की बचत और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाना भी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
आज यदि हम पर्यावरण संरक्षण को केवल एक सरकारी अभियान समझकर नजरअंदाज करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। जिस धरती ने हमें जीवन दिया है, उसे बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
यूरोप की भीषण गर्मी हमें यही संदेश दे रही है कि विकास तभी सार्थक है, जब प्रकृति सुरक्षित हो। यदि पेड़ नहीं बचेंगे, तो न शहर बचेंगे, न गांव, न अर्थव्यवस्था और न ही स्वस्थ जीवन।
आज लगाया गया एक पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का सबसे बड़ा उपहार बन सकता है। इसलिए आइए संकल्प लें—एक व्यक्ति, एक परिवार, कई पौधे; केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि वृक्ष संरक्षण भी हमारी जिम्मेदारी बने।
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