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मिसाल: 77 साल के डॉक्टर ने समाज के नाम कर दी करोड़ों की संपत्ति, मौत के बाद देहदान का भी लिया संकल्प
हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश | 13 अगस्त 2026
मोह-माया से ऊपर उठकर समाज के नाम कर दी जीवनभर की कमाई
आज के दौर में जहां इंसान जीवनभर संपत्ति जोड़ने और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की कोशिश करता है, वहीं हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के 77 वर्षीय डॉक्टर राजेंद्र कंवर ने त्याग और समाजसेवा की ऐसी मिसाल पेश की है, जो लंबे समय तक याद की जाएगी। उन्होंने अपनी और अपनी दिवंगत पत्नी कृष्णा कंवर की संपत्ति को समाज के हित में समर्पित करने का फैसला लिया।
डॉ. राजेंद्र कंवर की इस पहल को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने केवल संपत्ति ही समाज को समर्पित नहीं की, बल्कि अपनी मृत्यु के बाद देहदान करने का भी निर्णय लिया है, ताकि मेडिकल छात्रों को पढ़ाई और शोध के लिए उनकी देह का उपयोग किया जा सके। 2024 में उनके देहदान के फैसले की पुष्टि करते हुए रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी।
2021 में ही सरकार के नाम कर दी थी संपत्ति
रिपोर्टों के अनुसार, डॉ. कंवर ने जुलाई 2021 में अपनी और अपनी पत्नी की चल-अचल संपत्ति सरकार के नाम वसीयत की थी। उस समय संपत्ति का मूल्य अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 5 करोड़ से लेकर 60 करोड़ रुपये तक बताया गया था। अब 2026 की रिपोर्टों में मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर संपत्ति की कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है।
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 5 अगस्त 2026 को डॉ. कंवर ने जीवनकाल में ही गिफ्ट डीड के माध्यम से संपत्ति सरकार को सौंप दी और संबंधित भूमि का इंतकाल भी डॉ. राधाकृष्णन राजकीय मेडिकल कॉलेज हमीरपुर के नाम दर्ज किया गया।
संतान नहीं थी, पत्नी के साथ लिया था बड़ा फैसला
डॉ. राजेंद्र कंवर और उनकी पत्नी कृष्णा कंवर की कोई संतान नहीं थी। कृष्णा कंवर शिक्षा विभाग में करीब 32 वर्षों तक सेवाएं देने के बाद प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। दिसंबर 2020 में उनका निधन हो गया।
रिपोर्टों के अनुसार, दंपति ने अपने जीवनकाल में ही यह निर्णय लिया था कि उनकी संपत्ति का इस्तेमाल समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए। पत्नी के निधन के बाद डॉ. कंवर ने इस संकल्प को आगे बढ़ाया और अपनी संपत्ति सरकार के नाम कर दी।
बंगला, जमीन और अन्य संपत्तियां सरकार को समर्पित
दान की गई संपत्ति में दो मंजिला बंगला, जमीन, वाहन, आभूषण, फर्नीचर और बैंक में जमा धनराशि समेत अन्य संपत्तियां शामिल होने की जानकारी सामने आई है। डॉ. कंवर की इच्छा है कि इस संपत्ति का इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवाओं और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए किया जाए।
वह चाहते हैं कि यहां बुजुर्गों के लिए जेरियाट्रिक केयर, वृद्धाश्रम अथवा स्वास्थ्य से जुड़ी कोई विशेष सुविधा विकसित की जाए। उन्होंने यह भी इच्छा जताई है कि भविष्य में संस्थान का नाम उनकी दिवंगत पत्नी की स्मृति में ‘कृष्णा राजेंद्र’ रखा जाए।
33 साल तक सरकारी डॉक्टर रहे राजेंद्र कंवर
डॉ. राजेंद्र कंवर ने 3 जनवरी 1977 को स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सरकारी सेवा शुरू की थी। करीब 33 वर्षों तक मरीजों की सेवा करने के बाद वह 2010 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बावजूद उन्होंने मरीजों की सेवा से नाता नहीं तोड़ा और आज भी अपने घर पर कम शुल्क में लोगों का उपचार करते हैं। उनके सेवाभाव के कारण क्षेत्र में उन्हें ‘कांगू वाले डॉक्टर’ के नाम से भी जाना जाता है।
संपत्ति के बाद अब देहदान का भी फैसला
डॉ. कंवर का त्याग केवल संपत्ति दान करने तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद देहदान का संकल्प भी लिया है। मेडिकल छात्रों के अध्ययन के लिए उन्होंने एनाटॉमी विभाग को लिखित सहमति देने और आवश्यक पहचान संबंधी प्रक्रिया पूरी करने की जानकारी सामने आई है।
उनका यह निर्णय बताता है कि उनके लिए जीवनभर की कमाई का सबसे बड़ा उद्देश्य निजी संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज के काम आना है।
एसडीएम ने बताया समाज के लिए प्रेरणादायक कदम
नादौन के एसडीएम निशांत शर्मा ने डॉ. कंवर के फैसले को समाज के लिए प्रेरणादायक बताया है। उनके अनुसार, ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो अपनी मेहनत से अर्जित संपत्ति को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के लिए समर्पित कर देते हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, संपत्ति के हस्तांतरण के बाद राजस्व रिकॉर्ड में भी सरकार का नाम दर्ज हो चुका है।
पत्नी की याद को समाजसेवा से जोड़ना चाहते हैं
डॉ. राजेंद्र कंवर की कहानी केवल संपत्ति दान करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह पति-पत्नी के उस संकल्प की कहानी भी है, जिसमें उन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई को समाज के लिए उपयोगी बनाने का फैसला किया।
कृष्णा कंवर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी और राजेंद्र कंवर की सोच को आगे बढ़ाते हुए उनकी संपत्ति अब स्वास्थ्य और जनकल्याण के काम आ सकती है। यही कारण है कि डॉ. कंवर का फैसला त्याग, सेवा और मानवीय संवेदना की एक ऐसी मिसाल बन गया है, जिसकी आज जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।
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