Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

सच्चाई लिखना गुनाह क्यों बनता जा रहा है? मीडिया की स्वतंत्रता के सामने खड़ी होती दीवारें
बस्ती | 19 अगस्त 2026
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसका काम केवल घटनाओं को दर्ज करना नहीं, बल्कि उन सवालों को उठाना भी है जिन्हें आम आदमी उठाने में असमर्थ होता है। लेकिन आज जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों के सामने परिस्थितियां लगातार कठिन होती जा रही हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पत्रकार जब किसी के पक्ष में खबर लिखता है तो वह अच्छा पत्रकार कहलाता है, लेकिन जैसे ही वही पत्रकार किसी व्यवस्था की कमी, भ्रष्टाचार या लापरवाही को सामने लाता है, उसके सामने विरोध का पूरा तंत्र खड़ा हो जाता है।
सच्चाई लिखने की कीमत पत्रकार को क्यों चुकानी पड़ती है?
किसी गांव की ग्राम सभा में अनियमितता हो, किसी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार का आरोप हो, किसी विद्यालय में बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं में कमी हो या किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हों—पत्रकार का दायित्व है कि वह संबंधित पक्ष का भी बयान लेकर तथ्य जनता के सामने रखे।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब खबर किसी प्रभावशाली व्यक्ति, अधिकारी, संस्था या व्यवस्था के खिलाफ जाती है। खबर प्रकाशित होते ही पत्रकार से सवाल पूछे जाने लगते हैं कि उसने यह खबर क्यों लिखी। कई बार पत्रकार को दबाव, धमकी, शिकायत और मुकदमे जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
ऐसे माहौल में पत्रकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि वह सच लिखे या फिर अपने लिए मुश्किलें खड़ी होने से बचाए?
विद्यालयों में प्रवेश पर रोक से उठते हैं कई सवाल
हाल में बस्ती जिले के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी की ओर से परिषदीय विद्यालयों में पढ़ाई के दौरान गेट अंदर से बंद रखने और बाहरी व्यक्तियों, मीडिया कर्मियों तथा यूट्यूबर्स के प्रवेश को रोकने संबंधी निर्देश चर्चा में है। इसके पीछे पढ़ाई में व्यवधान न पड़ने की वजह बताई गई है।
निश्चित रूप से विद्यालयों में पढ़ाई का माहौल बनाए रखना जरूरी है। बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए और किसी भी बाहरी व्यक्ति का अनियंत्रित प्रवेश भी उचित नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि व्यवस्था की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का रास्ता क्या होगा?
यदि किसी विद्यालय में प्रवेश केवल सक्षम अधिकारी की अनुमति से ही संभव होगा, तो स्वाभाविक रूप से अधिकारी विद्यालय को पहले इसकी सूचना देगा। विद्यालय प्रशासन भी निरीक्षण या मीडिया के आने से पहले अपनी व्यवस्था दुरुस्त कर सकता है। ऐसे में वास्तविक स्थिति सामने आने की संभावना कम हो सकती है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समय-समय पर सरकारी विद्यालयों में मिड-डे मील और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी कमियों के वीडियो सामने आते रहे हैं। कहीं भोजन की गुणवत्ता पर सवाल उठे तो कहीं बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर शिकायतें सामने आईं। यदि स्वतंत्र निगरानी के रास्ते लगातार संकुचित होते गए तो ऐसी कमियां सामने कैसे आएंगी?
सुरक्षा और अनुशासन जरूरी, लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी
यह तर्क दिया जा सकता है कि पत्रकार या यूट्यूबर के नाम पर कोई भी व्यक्ति विद्यालय में प्रवेश नहीं कर सकता। यह बात अपनी जगह सही है। हर संस्थान की सुरक्षा और बच्चों की निजता महत्वपूर्ण है।
लेकिन समाधान पूर्ण प्रतिबंध होना नहीं, बल्कि स्पष्ट और पारदर्शी नियम होना चाहिए। मान्यता प्राप्त मीडिया कर्मियों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें बच्चों की तस्वीर या वीडियो बनाने के संबंध में स्पष्ट नियम हों, पढ़ाई में व्यवधान न हो और विद्यालय की वास्तविक स्थिति की रिपोर्टिंग भी संभव हो।
आखिरकार निगरानी का उद्देश्य विद्यालय को बदनाम करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए।
पुलिस और सरकारी कार्यालयों में भी यही सवाल
यही स्थिति कई बार पुलिस थानों और सरकारी कार्यालयों में भी दिखाई देती है। पत्रकार को फोटो या वीडियो बनाने की अनुमति को लेकर कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। निश्चित रूप से संवेदनशील मामलों, पीड़ितों की पहचान और जांच से जुड़ी गोपनीय जानकारी की सुरक्षा जरूरी है। लेकिन सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही और पारदर्शिता भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
जब किसी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने वाली खबर सामने आती है, तब पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई की आशंका या दबाव की स्थिति लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं मानी जा सकती। पुलिस का काम कानून लागू करना है और मीडिया का काम कानून के दायरे में रहकर व्यवस्था से जुड़े सवाल जनता तक पहुंचाना।
कहीं-कहीं सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भी सामने आते हैं जिनमें कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई की कहानी पर सवाल उठते हैं—जैसे किसी बरामदगी या गिरफ्तारी की प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा होना। ऐसे मामलों में स्वतंत्र जांच और पारदर्शिता ही सबसे बेहतर रास्ता है। पत्रकार को दोषी मान लेना या सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को विरोधी समझ लेना समाधान नहीं है।
पत्रकार किसी का पक्षकार नहीं, जनता की आंख और कान है
आज पत्रकार के सामने एक विचित्र परिस्थिति पैदा हो गई है। यदि वह किसी अधिकारी की उपलब्धि लिखता है तो उसे प्रशासन का करीबी बताया जा सकता है। यदि वह विपक्षी दल की खबर लिखता है तो उसे विपक्ष समर्थक कहा जा सकता है। यदि वह भ्रष्टाचार उजागर करता है तो भ्रष्टाचार में शामिल लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।
लेकिन पत्रकार का काम किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं है। उसका काम तथ्य सामने रखना है।
खबर में यदि किसी पर आरोप है तो उसका पक्ष भी होना चाहिए। यदि कोई अधिकारी अच्छा काम करता है तो उसकी खबर भी प्रकाशित होनी चाहिए। और यदि कहीं कमी है तो उस कमी पर सवाल भी उठना चाहिए। यही संतुलित पत्रकारिता है।
ग्राम सभा से लेकर सत्ता के गलियारों तक चुनौती
यह समस्या केवल स्कूल या पुलिस थाने तक सीमित नहीं है। ग्राम सभा से लेकर ब्लॉक, तहसील, जिला प्रशासन, राजनीतिक दल और विभिन्न सरकारी विभागों तक पत्रकार को कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जहां खबर लिखने के बाद किसी न किसी पक्ष की नाराजगी सामने आ जाती है।
पत्रकार के पास न कोई सरकारी सुरक्षा कवच होता है और न ही हर खबर के बाद अपने खिलाफ होने वाली शिकायतों से लड़ने के लिए असीमित संसाधन।
फिर भी वह कैमरा और कलम लेकर मैदान में उतरता है, क्योंकि जनता को जानकारी देना उसका दायित्व है।
अगर हर खबर पहले से तय होगी तो पत्रकार की जरूरत ही क्या है?
कल्पना कीजिए कि सरकार सभी पत्रकारों को घर बैठाकर समाचार उपलब्ध करा दे और निर्देश दे कि केवल वही समाचार प्रकाशित या प्रसारित किया जाए। तब समाचार पत्र और समाचार चैनल महज सरकारी सूचना पत्र बनकर रह जाएंगे।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्तियां महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन पत्रकारिता केवल प्रेस विज्ञप्ति पढ़कर सुनाने का नाम नहीं है। पत्रकारिता का वास्तविक महत्व तब सामने आता है जब पत्रकार किसी सूचना की स्वतंत्र रूप से पड़ताल करता है, मौके पर जाता है, संबंधित लोगों से बात करता है और फिर तथ्यों के आधार पर खबर जनता तक पहुंचाता है।
प्रशासन और मीडिया को टकराव नहीं, संवाद की जरूरत
मीडिया और प्रशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं। प्रशासन का काम व्यवस्था चलाना है और मीडिया का काम उस व्यवस्था को जनता की नजर से देखना तथा सवाल पूछना।
यदि किसी पत्रकार की रिपोर्ट गलत है तो प्रशासन के पास तथ्यात्मक खंडन का अधिकार है। यदि खबर में कोई तथ्य गलत है तो उसका स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। गंभीर मामलों में कानून अपना रास्ता अपना सकता है।
लेकिन हर आलोचना को दुश्मनी और हर सवाल को विरोध मान लेना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।
जरूरत इस बात की है कि मीडिया कर्मियों के लिए स्पष्ट, समान और पारदर्शी नियम बनाए जाएं। विद्यालयों, थानों और सरकारी कार्यालयों में प्रवेश तथा रिकॉर्डिंग को लेकर ऐसी नीति हो जिसमें सुरक्षा और गोपनीयता के साथ-साथ स्वतंत्र पत्रकारिता का अधिकार भी सुरक्षित रहे।
सवाल सिर्फ पत्रकार का नहीं, जनता के अधिकार का है
जब किसी पत्रकार को किसी सरकारी विद्यालय में जाने से रोका जाता है, किसी सार्वजनिक व्यवस्था पर सवाल उठाने में बाधा आती है या किसी खबर के बाद उसे दबाव का सामना करना पड़ता है, तो सवाल केवल एक पत्रकार का नहीं रह जाता।
सवाल यह बन जाता है कि जनता को वास्तविक स्थिति की जानकारी कैसे मिलेगी?
लोकतंत्र में मजबूत प्रशासन जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि प्रशासन से सवाल पूछने की जगह भी बनी रहे। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जहां कोई सवाल न पूछे जाएं, बल्कि वह है जहां कठिन सवाल पूछे जाने के बाद भी व्यवस्था जवाब देने के लिए तैयार रहे।
पत्रकार को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और प्रशासन को भी। पत्रकारिता के नाम पर किसी की निजता या कानून का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर स्वतंत्र और तथ्यात्मक पत्रकारिता के रास्ते भी बंद नहीं होने चाहिए।
सच्चाई सामने आने से व्यवस्था कमजोर नहीं होती, बल्कि व्यवस्था को अपनी कमियां सुधारने का अवसर मिलता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पत्रकार को कैसे रोका जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिसमें पत्रकार को किसी कमी को छिपाने की जरूरत ही न पड़े।
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