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उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने वाले UGC के नए नियमों पर फिर विचार करेगी केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट ने मांगा विस्तृत जवाब
नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
देश के विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए University Grants Commission (UGC) Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान दिया है। केंद्र ने अदालत को बताया कि वह इन नए नियमों पर दोबारा विचार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए UGC को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
UGC की आधिकारिक वेबसाइट पर भी 2026 के Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations को 13 जनवरी 2026 को प्रकाशित किए गए नए नियमों में सूचीबद्ध किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने क्या कहा
गुरुवार, 20 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इन नियमों के प्रावधानों पर पुनर्विचार कर रही है। हालांकि, सरकार ने अभी यह अंतिम रूप से तय नहीं किया है कि नियमों में संशोधन किया जाएगा, उन्हें वापस लिया जाएगा या कोई अन्य रास्ता अपनाया जाएगा।
अदालत ने UGC को मामले में चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम से साफ है कि 2026 के नियमों को लेकर सरकार और न्यायपालिका के स्तर पर गंभीर समीक्षा चल रही है।
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक
UGC ने जनवरी 2026 में नए इक्विटी नियम अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों और अन्य संबंधित लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए एक विस्तृत व्यवस्था तैयार करना था।
हालांकि, इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को इनके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। अदालत ने प्रथम दृष्टया कुछ प्रावधानों को लेकर गंभीर सवाल उठाए और कहा था कि नियमों की भाषा और उनका इस्तेमाल सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाला प्रभाव पैदा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर 2012 के पुराने UGC नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया था, जब तक कि मामले में आगे कोई आदेश नहीं दिया जाता।
याचिकाकर्ताओं ने नियमों में किस बात पर आपत्ति जताई
नए नियमों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं में मुख्य आपत्ति यह है कि नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और उसके दायरे को लेकर ऐसी व्यवस्था बनाई गई है, जिसे याचिकाकर्ता SC, ST और OBC समुदायों तक सीमित मान रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव रोकना उद्देश्य है तो सुरक्षा का दायरा सभी विद्यार्थियों और समुदायों के लिए समान होना चाहिए। इसी से जुड़े प्रावधानों, विशेषकर Regulation 3(C), को लेकर भी अदालत के सामने चुनौती रखी गई है।
यह विवाद केवल नियमों की भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह बड़ा सवाल भी जुड़ा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए नियमों में भेदभाव की पहचान और शिकायत निवारण की व्यवस्था किस तरह तैयार की जाए।
रैगिंग को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों की सुनवाई के दौरान रैगिंग को लेकर भी सवाल उठाए थे। अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि यदि किसी विद्यार्थी को रैगिंग के कारण उत्पीड़न या भेदभाव का सामना करना पड़ता है तो उसे इक्विटी से जुड़े नियमों के तहत किस तरह संबोधित किया जाएगा।
UGC की ओर से रैगिंग रोकने के लिए अलग नियम पहले से मौजूद हैं। UGC की वेबसाइट पर अगस्त 2026 में उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने संबंधी नियमों के कड़ाई से पालन का पत्र भी सूचीबद्ध है।
इसलिए अदालत के समक्ष यह भी महत्वपूर्ण सवाल रहा है कि अलग-अलग नियमों के बीच विद्यार्थियों की शिकायतों और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त समन्वय किस तरह सुनिश्चित किया जाए।
नए UGC नियमों का उद्देश्य क्या था
2026 के इक्विटी नियमों का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर, भेदभाव की रोकथाम और शिकायतों के निवारण के लिए एक संस्थागत व्यवस्था तैयार करना था। इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिकायतों से निपटने और इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं की व्यवस्था की गई थी।
लेकिन नियम लागू होने से पहले ही इनके कुछ प्रावधानों को लेकर विरोध और कानूनी चुनौती सामने आ गई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इनके क्रियान्वयन पर फिलहाल रोक बनी हुई है।
अब आगे क्या होगा
अब केंद्र सरकार के पुनर्विचार के बाद इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम UGC का विस्तृत जवाब होगा। चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट यह देखेगा कि सरकार ने नियमों के विवादित प्रावधानों पर क्या रुख अपनाया है।
संभावना है कि सरकार नियमों में संशोधन, स्पष्टीकरण या अन्य कानूनी विकल्पों पर अपना पक्ष अदालत के सामने रखे। फिलहाल 2026 के नए इक्विटी नियमों का भविष्य सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और केंद्र सरकार की समीक्षा पर निर्भर करेगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा असर देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों, समान अवसर और विद्यार्थियों के अधिकारों की संस्थागत सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
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