IPS बजरंग प्रसाद यादव;संघर्ष से आईपीएस तक का सफर…….

Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

पिता की हत्या के बाद भी नहीं टूटा हौसला, अनाज बेचकर भरी UPSC की फीस; तीसरे प्रयास में 454वीं रैंक लाकर IPS बने बस्ती के बजरंग प्रसाद यादव

बस्ती | 21 अगस्त 2026

सरयू नदी के किनारे बसे बस्ती जिले के माझा क्षेत्र का एक छोटा सा गांव धोबहट। गांव की गलियों, खेतों और सामान्य ग्रामीण परिवेश से निकलकर कोई युवा देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में शामिल हो जाए, तो उसकी सफलता अपने आप में खास होती है। लेकिन बजरंग प्रसाद यादव की कहानी सिर्फ UPSC पास करने की कहानी नहीं है। यह कहानी उस बेटे की है, जिसने तैयारी के बीच अपने पिता को खो दिया, परिवार पर आई आर्थिक तंगी का सामना किया, पढ़ाई की फीस जुटाने के लिए खेत का अनाज तक बेचना पड़ा, लगातार दो बार असफलता का दर्द सहा और फिर भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटे।

बजरंग प्रसाद यादव ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2022 में देशभर में 454वीं रैंक हासिल कर भारतीय पुलिस सेवा यानी IPS में चयन प्राप्त किया। उनकी सफलता की कहानी इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि जिस दौर में एक ओर वह देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, उसी दौरान उनके परिवार पर ऐसा संकट आया जिसने किसी भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ सकता था। लेकिन बजरंग ने परिस्थितियों के सामने घुटने टेकने के बजाय उन्हें अपनी ताकत बनाया।

सरयू किनारे के गांव से शुरू हुआ सफर

बजरंग प्रसाद यादव मूल रूप से बस्ती जिले के बहादुरपुर विकास क्षेत्र के धोबहट गांव के रहने वाले हैं। यह गांव सरयू नदी के तटीय क्षेत्र में आता है। उनका परिवार सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। उनके पिता राजेश यादव किसान थे और गांव में खेती-किसानी के साथ जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए भी जाने जाते थे। उनकी मां कुसुमकला धोबहट ग्राम पंचायत की प्रधान रही हैं।

बजरंग के परिवार में कई भाई-बहन हैं। परिवार की जिम्मेदारियों और ग्रामीण परिवेश के बावजूद उनकी पढ़ाई को लेकर परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया। बचपन से ही पढ़ाई में रुचि रखने वाले बजरंग ने गांव से अपनी प्रारंभिक शिक्षा शुरू की और आगे बढ़ते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में कदम रखा।

पढ़ाई में शुरू से रहे मेधावी

बजरंग प्रसाद की शुरुआती शिक्षा गांव में हुई। इसके बाद उन्होंने लिटिल फ्लावर स्कूल, कलवारी से हाईस्कूल की पढ़ाई की और उर्मिला एजुकेशनल एकेडमी, बस्ती से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 2016 में इंटरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया और जिले की मेरिट सूची में स्थान बनाया था।

इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय का रुख किया। वर्ष 2019 में उन्होंने वहां से गणित विषय में बीएससी की डिग्री हासिल की। इसके बाद उनका लक्ष्य सामान्य नौकरी तक सीमित नहीं रहा। उनके मन में देश की प्रतिष्ठित सिविल सेवा में जाने का सपना आकार लेने लगा।

पिता का सपना था बेटा बड़ा अधिकारी बने

बजरंग की जिंदगी में उनके पिता राजेश यादव की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। किसान परिवार से होने के बावजूद पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बने और समाज के कमजोर लोगों की मदद करे।

यही सपना बाद में बजरंग के जीवन का लक्ष्य बन गया। विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने का फैसला लिया और तैयारी के लिए दिल्ली चले गए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 2019 में वह दिल्ली जाकर UPSC की तैयारी में जुटे थे।

लेकिन शायद जिंदगी ने उनके लिए संघर्ष का सबसे कठिन अध्याय अभी बाकी रखा था।

वर्ष 2020 में पिता की हत्या ने परिवार को झकझोर दिया

जब बजरंग दिल्ली में अपने सपने को पूरा करने के लिए UPSC की तैयारी कर रहे थे, उसी दौरान वर्ष 2020 में उनके पिता राजेश यादव की हत्या कर दी गई। यह घटना पूरे परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक थी। पिता का साया अचानक सिर से उठ जाने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

बजरंग के लिए यह सिर्फ पिता को खोने का दुख नहीं था। जिस पिता ने उन्हें पढ़ाया, आगे बढ़ने का सपना दिखाया और अधिकारी बनने के लिए प्रेरित किया, वही पिता अब उनके बीच नहीं थे।

इस घटना ने बजरंग को भीतर तक झकझोर दिया। लेकिन उन्होंने अपने पिता के सपने को अधूरा छोड़ने के बजाय उसे पूरा करने का संकल्प लिया। उन्होंने तय किया कि वह UPSC की परीक्षा पास करेंगे और व्यवस्था का हिस्सा बनकर समाज के कमजोर और असहाय लोगों की मदद करेंगे। भारत की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक की तैयारी के बीच इतना बड़ा व्यक्तिगत आघात झेलना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपना संयम बनाए रखा।

आर्थिक तंगी के बीच अनाज बेचकर जुटाई पढ़ाई की फीस

📍 मां के साथ आईपीएस बजरंग

पिता की मौत के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ा। ग्रामीण किसान परिवार के लिए दिल्ली में रहकर UPSC जैसी महंगी और लंबी तैयारी करना आसान नहीं था।

बजरंग के सामने कोचिंग और तैयारी से जुड़े खर्चों को पूरा करने की चुनौती थी। ऐसे समय में उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। रिपोर्टों के अनुसार, UPSC की तैयारी और कोचिंग की फीस जुटाने के लिए परिवार को खेत की फसल और अनाज तक बेचना पड़ा।

जिस अनाज को परिवार के भरण-पोषण और भविष्य की जरूरतों के लिए बचाकर रखा जाता है, उसी को बेटे की पढ़ाई के लिए बेच देना इस बात को दिखाता है कि बजरंग और उनके परिवार ने अपने लक्ष्य को लेकर कितनी बड़ी कीमत चुकाई।

इस कठिन दौर में उनकी मां कुसुमकला उनके साथ मजबूती से खड़ी रहीं। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियों के बीच बेटे को पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना मां के संघर्ष का भी अहम हिस्सा रहा।

हिंदी माध्यम से UPSC की तैयारी

बजरंग प्रसाद यादव की सफलता का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने हिंदी माध्यम से UPSC की तैयारी की। UPSC जैसी परीक्षा में जहां देशभर के लाखों अभ्यर्थी शामिल होते हैं और संसाधनों, मार्गदर्शन तथा प्रतिस्पर्धा का दबाव रहता है, वहां सीमित संसाधनों के बीच हिंदी माध्यम से तैयारी कर सफलता हासिल करना उनके आत्मविश्वास और मेहनत को दर्शाता है।

उनकी कहानी यह संदेश देती है कि किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता केवल महंगे संस्थानों, बड़े शहरों या अंग्रेजी माध्यम तक सीमित नहीं है। सही रणनीति, अनुशासन, निरंतर अध्ययन और अपनी गलतियों से सीखने की क्षमता हो तो ग्रामीण पृष्ठभूमि का छात्र भी देश की सर्वोच्च सेवाओं तक पहुंच सकता है।

दो बार मिली असफलता, एक बार सिर्फ 27 नंबर से रह गए पीछे

UPSC की तैयारी में बजरंग को पहली ही कोशिश में सफलता नहीं मिली। उन्हें लगातार दो प्रयासों में असफलता का सामना करना पड़ा।

इन असफलताओं में एक ऐसा मौका भी आया जब वह UPSC मुख्य परीक्षा में महज 27 अंकों से पीछे रह गए। इतनी नजदीकी असफलता किसी भी अभ्यर्थी के लिए बेहद निराशाजनक हो सकती है। वर्षों की मेहनत के बाद जब मंजिल कुछ ही कदम दूर रह जाए और सफलता हाथ न आए, तो कई लोग तैयारी छोड़ देते हैं।

लेकिन बजरंग ने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने असफलता को अपनी कमजोरी मानने के बजाय अपनी कमियों को पहचानने का अवसर बनाया। उन्होंने अपनी तैयारी का विश्लेषण किया, गलतियों को समझा और अगले प्रयास के लिए खुद को पहले से ज्यादा मजबूत किया।

यही वह दौर था जिसने उनके व्यक्तित्व को और मजबूत बनाया।

तीसरे प्रयास में बदल गई पूरी जिंदगी

दो असफलताओं के बाद भी बजरंग प्रसाद यादव ने हार नहीं मानी। उन्होंने तीसरे प्रयास के लिए फिर से तैयारी शुरू की। इस बार उनके सामने सिर्फ UPSC परीक्षा पास करने का लक्ष्य नहीं था, बल्कि वर्षों के संघर्ष, पिता के सपने और परिवार की उम्मीदों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी थी।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2022 में उनकी मेहनत आखिरकार रंग लाई। उन्होंने ऑल इंडिया 454वीं रैंक हासिल की। उनकी इस सफलता के बाद धोबहट गांव से लेकर पूरे बस्ती जिले में खुशी की लहर दौड़ गई।

गांव में जब वह सफलता हासिल करने के बाद पहुंचे तो लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया। उनके घर में मां, दादी और परिवार के अन्य सदस्यों की आंखों में खुशी के साथ पिता की कमी का दर्द भी साफ महसूस किया जा सकता था। उनके स्वागत के दौरान दिवंगत पिता राजेश यादव की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी गई।

454वीं रैंक से IPS अधिकारी बनने तक

UPSC CSE 2022 में 454वीं रैंक हासिल करने के बाद बजरंग प्रसाद यादव भारतीय पुलिस सेवा में आए। वह 2023 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं।

उनकी कहानी का यह हिस्सा भी खास है कि जिस बेटे ने कभी अपने पिता की हत्या के बाद व्यवस्था के भीतर रहकर कमजोर लोगों की मदद करने का संकल्प लिया था, वही आगे चलकर पुलिस सेवा का हिस्सा बना।

हालिया रिपोर्टों में उन्हें मेरठ में प्रशिक्षण/व्यावहारिक तैनाती के दौरान भी सक्रिय बताया गया है। नवंबर 2025 की एक पोस्टिंग रिपोर्ट में 2023 बैच के IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण के क्रम में बजरंग प्रसाद को मेरठ भेजे जाने का उल्लेख है। मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में मेरठ में साइबर अपराध जागरूकता कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षु IPS अधिकारी के रूप में उनकी भागीदारी का भी उल्लेख हुआ।

वर्तमान में उनकी पोस्टिंग अपर पुलिस अधीक्षक प्रशिक्षण, आगरा के रूप में हुई है।

पिता के हत्यारों को मिली सजा, छह साल बाद मिला न्याय

बजरंग प्रसाद की कहानी का सबसे भावुक अध्याय वर्ष 2026 में उस समय सामने आया, जब उनके पिता राजेश यादव की हत्या के मामले में न्यायालय ने फैसला सुनाया।

हालिया अदालती रिपोर्टों के अनुसार, बस्ती में मामले की सुनवाई के बाद नौ अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया और प्रत्येक को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। प्रत्येक दोषी पर 7,500 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। रिपोर्टों के अनुसार दोषसिद्धि गैर इरादतन हत्या के मामले में हुई।

यह फैसला बजरंग के लिए महज एक कानूनी घटनाक्रम नहीं था। उनके जीवन के उस संकल्प का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जिसकी शुरुआत पिता की हत्या के बाद हुई थी।

जिस समय वह दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पिता को खोया था। उसी दर्द को अपने भीतर लेकर उन्होंने परीक्षा की तैयारी जारी रखी, असफलताओं का सामना किया और अंततः IPS अधिकारी बने। अब वर्षों बाद अदालत से पिता की हत्या के मामले में दोषियों को सजा मिलने से उनके जीवन की उस लंबी लड़ाई को एक महत्वपूर्ण न्यायिक परिणाम मिला।

एक किसान परिवार का बेटा बना युवाओं की मिसाल

बजरंग प्रसाद यादव की कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता के पीछे सिर्फ किताबें और परीक्षा नहीं हैं। इसमें एक किसान पिता का सपना है, मां का संघर्ष है, परिवार की आर्थिक परेशानियां हैं, पिता को खोने का असहनीय दर्द है, पढ़ाई के लिए अनाज बेचने की मजबूरी है, दो बार की असफलता है और फिर भी लक्ष्य से न हटने का जुनून है।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि असफलता और परिस्थितियां व्यक्ति की अंतिम पहचान नहीं होतीं। व्यक्ति की असली पहचान इस बात से बनती है कि वह कठिन समय में क्या फैसला करता है और कितनी बार गिरने के बाद दोबारा खड़ा होता है।

बजरंग दो बार UPSC में सफल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने तीसरी कोशिश को अपनी आखिरी कोशिश नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी गलतियों को समझा और तैयारी जारी रखी। आखिरकार वही मेहनत उन्हें देश की प्रतिष्ठित भारतीय पुलिस सेवा तक लेकर गई।

छात्रों के लिए बजरंग प्रसाद यादव की कहानी का संदेश

बजरंग प्रसाद यादव की जीवनी खास तौर पर उन छात्रों के लिए प्रेरणा है जो छोटे गांवों, सामान्य परिवारों और सीमित आर्थिक संसाधनों से आते हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि UPSC जैसी परीक्षा के लिए सबसे जरूरी चीज केवल संसाधन नहीं, बल्कि लंबे समय तक लगातार मेहनत करने का धैर्य है।

उनकी यात्रा से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं—

पहली सीख—परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, लक्ष्य नहीं छोड़ना चाहिए।

दूसरी सीख—एक या दो असफलताएं आपकी क्षमता का अंतिम फैसला नहीं होतीं।

तीसरी सीख—अपनी गलतियों का विश्लेषण करके अगली तैयारी को बेहतर बनाया जा सकता है।

चौथी सीख—हिंदी माध्यम या ग्रामीण पृष्ठभूमि सफलता की राह में अंतिम बाधा नहीं है।

पांचवीं सीख—परिवार का भरोसा और स्वयं पर विश्वास कठिन समय में सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।

और शायद सबसे बड़ी सीख यह है कि जिंदगी कभी-कभी इंसान से उसकी सबसे बड़ी परीक्षा उसी समय लेती है, जब वह अपने सबसे बड़े सपने के सबसे करीब होता है।

धोबहट से दिल्ली और दिल्ली से IPS तक का सफर

बस्ती के धोबहट गांव से निकलने वाला यह युवा जब दिल्ली पहुंचा था, तब उसके पास एक सपना था। रास्ते में उसने पिता को खोया, आर्थिक कठिनाइयां देखीं, पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए परिवार को अनाज तक बेचना पड़ा, दो बार UPSC में असफलता मिली और फिर तीसरे प्रयास में 454वीं रैंक हासिल की।

आज बजरंग प्रसाद यादव की पहचान केवल एक सफल UPSC अभ्यर्थी की नहीं, बल्कि संघर्ष से निकलकर IPS अधिकारी बनने वाले उस युवा की है, जिसकी कहानी में दर्द भी है, संघर्ष भी है और सफलता का मजबूत संदेश भी।

उनकी कहानी उन हजारों छात्रों को यह भरोसा देती है कि गांव से निकलने वाला छात्र भी बड़े सपने देख सकता है और उन्हें पूरा कर सकता है। रास्ता कठिन हो सकता है, समय लंबा लग सकता है, कई बार असफलता मिल सकती है, लेकिन यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो मंजिल हासिल की जा सकती है।

बजरंग प्रसाद यादव की जिंदगी में उनके पिता का सपना आज भी एक भावनात्मक आधार की तरह दिखाई देता है। पिता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन बेटे की सफलता और अब न्यायालय से दोषियों को मिली सजा के रूप में उनकी स्मृति और संघर्ष की कहानी एक नई पीढ़ी के सामने प्रेरणा बनकर खड़ी है।

धोबहट गांव के खेतों से शुरू हुई यह कहानी आज IPS की वर्दी तक पहुंच चुकी है—और यही बजरंग प्रसाद यादव की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने परिस्थितियों को अपनी किस्मत नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी मेहनत से अपनी किस्मत खुद लिखी।

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