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‘गॉडजिला’ बन रहा अल नीनो! 2027 तक रहेगा असर, मौसम के बिगड़ते मिजाज से भारत समेत दुनिया पर बढ़ा खतरा
नई दिल्ली 4 सितम्बर 2026।
प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहा समुद्र अब पूरी दुनिया के मौसम के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 3 सितंबर 2026 को जारी अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अल नीनो आने वाले महीनों में और मजबूत होकर ‘बहुत मजबूत’ स्तर तक पहुंच सकता है और इसका प्रभाव फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है।
WMO के मुताबिक, अल नीनो इस समय प्रशांत महासागर में मजबूती से स्थापित हो चुका है और वर्ष के अंतिम महीनों में इसके चरम पर पहुंचने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके कारण दुनिया के कई हिस्सों में तापमान और बारिश के सामान्य पैटर्न में बड़ा बदलाव आ सकता है। इसका असर सूखे, बाढ़ और अत्यधिक गर्मी के रूप में सामने आने की आशंका है।
प्रशांत महासागर में बढ़ रही असामान्य गर्मी
अल नीनो की सबसे बड़ी वजह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के समुद्री पानी का सामान्य से ज्यादा गर्म होना है। इस बार समुद्र की गर्मी असाधारण स्तर पर पहुंच रही है।
WMO के अनुसार, जुलाई 2026 में Niño 3.4 क्षेत्र का समुद्री सतह तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस अधिक था। इसके बाद जुलाई के आखिर से अगस्त के मध्य तक साप्ताहिक आंकड़ों में यह अंतर लगभग 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि समुद्र की सतह के नीचे कुछ हिस्सों में जुलाई और अगस्त की शुरुआत के दौरान तापमान सामान्य से 8 डिग्री सेल्सियस से अधिक पाया गया।
यही वजह है कि वैज्ञानिक इस अल नीनो के तेजी से मजबूत होने को बेहद गंभीरता से देख रहे हैं। समुद्र के भीतर जमा यह अतिरिक्त गर्म पानी आने वाले महीनों में अल नीनो की तीव्रता को और बढ़ा सकता है।
फरवरी 2027 तक बना रह सकता है असर
WMO के नवीनतम पूर्वानुमानों के मुताबिक सितंबर-नवंबर 2026 और दिसंबर 2026-फरवरी 2027 दोनों अवधियों में अल नीनो के बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। संगठन का अनुमान है कि यह घटना 2026 के अंत के आसपास बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच सकती है।
WMO ने यह भी स्पष्ट किया है कि मजबूत अल नीनो का मतलब हर देश में एक जैसा मौसम नहीं होता। अलग-अलग क्षेत्रों में इसका असर वहां की भौगोलिक स्थिति, मौसम और दूसरे समुद्री-वायुमंडलीय कारकों के आधार पर अलग हो सकता है। इसलिए इसे सीधे तौर पर यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में सर्दी खत्म हो जाएगी, लेकिन मौसम के सामान्य पैटर्न में बदलाव का जोखिम जरूर बढ़ गया है।
क्या इस बार कम पड़ेगी ठंड?
अल नीनो के मजबूत होने से तापमान के सामान्य पैटर्न में बदलाव की संभावना है। WMO के सितंबर-नवंबर 2026 के वैश्विक पूर्वानुमान में दुनिया के लगभग सभी भू-भागों में सामान्य से अधिक तापमान की संभावना बढ़ी हुई बताई गई है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत में इस बार ठंड पड़ेगी ही नहीं। स्थानीय मौसम पर पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी परिस्थितियां, जेट स्ट्रीम और अन्य क्षेत्रीय कारकों का भी प्रभाव रहेगा। इसलिए आने वाली सर्दियों की वास्तविक तीव्रता का आकलन आगे जारी होने वाले क्षेत्रीय पूर्वानुमानों से ही अधिक स्पष्ट होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
भारत के लिए अल नीनो का मजबूत होना खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अल नीनो वैश्विक स्तर पर वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करने वाला प्रमुख प्राकृतिक जलवायु कारक है। इसका असर कृषि, जल संसाधन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
WMO ने भी चेतावनी दी है कि बहुत मजबूत अल नीनो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सूखे, अत्यधिक बारिश, बाढ़ और गर्मी का खतरा बढ़ा सकता है। संगठन ने कृषि, स्वास्थ्य, पानी, ऊर्जा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में पहले से तैयारी बढ़ाने पर जोर दिया है।
कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ का खतरा
अल नीनो का असर दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा नहीं होता। कहीं बारिश सामान्य से कम हो सकती है और सूखे का खतरा बढ़ सकता है, तो दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ की परिस्थितियां बन सकती हैं।
यही वजह है कि वैज्ञानिक सिर्फ तापमान पर नजर नहीं रख रहे, बल्कि बारिश, समुद्री तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले बदलावों को भी लगातार मॉनिटर कर रहे हैं।
WMO के अनुसार, सितंबर-नवंबर 2026 के दौरान वैश्विक स्तर पर सामान्य से अधिक तापमान की संभावना बढ़ी हुई है, जबकि वर्षा के पैटर्न में क्षेत्रीय स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
‘गॉडजिला’ नाम वैज्ञानिक नहीं, लेकिन खतरा वास्तविक
‘गॉडजिला अल नीनो’ कोई आधिकारिक वैज्ञानिक नाम नहीं है। यह बेहद शक्तिशाली अल नीनो की तीव्रता को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा लोकप्रिय शब्द है। आधिकारिक तौर पर WMO इसे बहुत मजबूत (very strong) El Niño event के रूप में देख रहा है।
WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने चेताया है कि यह असाधारण अल नीनो समुदायों, अर्थव्यवस्थाओं और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बड़ा असर डाल सकता है। संगठन का कहना है कि पहले से दिख रहे सूखे, बाढ़ और चरम मौसम के प्रभाव अल नीनो के मजबूत होने के साथ और बढ़ सकते हैं।
2024 का रिकॉर्ड भी टूट सकता है!
मौसम विज्ञानियों की चिंता सिर्फ इस साल के मौसम तक सीमित नहीं है। WMO के मुताबिक 2023-24 के मजबूत अल नीनो ने 2024 को रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्ष बनाने में योगदान दिया था। संगठन ने कहा है कि मौजूदा घटनाक्रम को देखते हुए भविष्य में वह रिकॉर्ड भी टूट सकता है।
फिलहाल वैज्ञानिकों की नजर प्रशांत महासागर पर टिकी है। आने वाले कुछ महीने यह तय करने में बेहद अहम होंगे कि यह अल नीनो कितना शक्तिशाली बनता है और भारत समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसका वास्तविक असर कितना गहरा होता है।
यानी खतरे की घंटी जरूर बज चुकी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर जगह तबाही तय है। सही समय पर मौसम की चेतावनी, कृषि योजना और आपदा प्रबंधन की तैयारी इस बदलते मौसम के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकती है।
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