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हरदा की सियासत: गांव की पगडंडी से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की पूरी कहानी
बस्ती, 12 सितंबर 2026।
उत्तराखंड की सियासत में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें किसी पद की पहचान की जरूरत नहीं पड़ती। उनमें एक नाम हरीश रावत का है। समर्थकों के बीच प्यार से ‘हरदा’ कहलाने वाले हरीश रावत ने राजनीति में लंबी पारी खेली है—संगठन से लेकर संसद तक, केंद्र की सत्ता से लेकर उत्तराखंड की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक। अब उन्होंने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा देकर एक बार फिर राजनीतिक हलकों में चर्चा छेड़ दी है।
लेकिन हरदा की कहानी सिर्फ मुख्यमंत्री बनने या केंद्रीय मंत्री रहने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे पहाड़ के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाने का लंबा सफर है।
अल्मोड़ा के गांव से शुरू हुई कहानी
हरीश रावत का जन्म 27 अप्रैल 1948 को अल्मोड़ा के मोहनरी गांव में एक कुमाऊंनी राजपूत परिवार में हुआ था। उनके पिता राजेंद्र सिंह रावत और मां देवकी देवी थीं। पहाड़ के साधारण परिवेश में पले-बढ़े हरीश रावत ने शुरुआती शिक्षा गवर्नमेंट इंटर कॉलेज चौनलिया से हासिल की।
इसके बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय का रुख किया और वहां से बीए तथा एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। कानून की पढ़ाई ने उन्हें तर्क और संवाद का रास्ता दिया, जबकि राजनीति ने उन्हें जनता के बीच अपनी बात रखने का मंच।
संगठन से संसद तक पहुंचने की पहली बड़ी छलांग
हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक यात्रा किसी बड़े पद से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से शुरू की। ब्लॉक स्तर की राजनीति से आगे बढ़ते हुए वह युवा कांग्रेस से जुड़े और धीरे-धीरे संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करते गए।
साल 1980 उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र से उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी को शिकस्त देकर पहली बार संसद का रास्ता तय किया। यह जीत सिर्फ एक चुनावी सफलता नहीं थी, बल्कि पहाड़ की राजनीति में हरीश रावत के उभरते प्रभाव का संकेत भी थी।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1984 में उन्होंने एक बार फिर मुरली मनोहर जोशी को हराया और 1989 में भी लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
दिल्ली में बढ़ता कद
लोकसभा की राजनीति के साथ हरीश रावत का कद राष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ता गया। उन्हें केंद्र में श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद संगठन और संसद से जुड़े कई महत्वपूर्ण दायित्व उनके हिस्से आए।
साल 1990 में उन्होंने संचार से जुड़े दायित्व संभाले। मार्च 1990 में वह राजभाषा कमेटी के सदस्य बने। 1992 में अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने और बाद के वर्षों में विभिन्न संसदीय समितियों में भी भूमिका निभाई।
2001 में उन्हें उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान मिली। इसके बाद 2002 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए।
केंद्र की राजनीति में उनकी वापसी भी लगातार होती रही। 2009 में उन्हें फिर श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री बनाया गया। 2011 में राज्य मंत्री के रूप में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के साथ संसदीय कार्य का दायित्व संभाला। इसके बाद 2012 से 2014 तक वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में जल संसाधन मंत्री रहे।
आखिरकार पहाड़ की सत्ता का रास्ता खुला
लंबे केंद्रीय राजनीतिक अनुभव के बाद वह समय आया जब हरीश रावत ने उत्तराखंड की सत्ता की कमान संभाली।
1 फरवरी 2014 को हरीश रावत पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति ने उनके सामने जल्द ही ऐसा मोड़ ला दिया, जिसने उनके कार्यकाल को अस्थिरता के दौर में पहुंचा दिया।
1 अप्रैल 2016 को वह दोबारा मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 11 मई 2016 को फिर से उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली और वह 18 मार्च 2017 तक इस पद पर रहे।
यानी हरीश रावत ने उत्तराखंड की कमान तीन बार संभाली, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम ऐसा रहा कि वह मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।
निजी जिंदगी में भी परिवार का राजनीति से रिश्ता
राजनीति के बाहर हरीश रावत का परिवार भी चर्चा में रहा है। उन्होंने रेणुका रावत से विवाह किया। उनके तीन बच्चे हैं। बेटे आनंद सिंह रावत राजनीति से जुड़े हैं, जबकि बेटी अनुपमा रावत भी राजनीति में सक्रिय रही हैं। उनकी दूसरी बेटी आरती रावत हैं।
एक सफर, कई पड़ाव और अब नया मोड़
हरीश रावत का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। अल्मोड़ा के गांव से शुरू हुआ सफर उन्हें लोकसभा, राज्यसभा और केंद्रीय मंत्रिमंडल तक ले गया। इसके बाद उन्होंने अपने राज्य की राजनीति में सबसे बड़ा पद यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी संभाली।
अब कांग्रेस के सभी पदों से उनका इस्तीफा उनके लंबे राजनीतिक सफर में एक नया अध्याय जोड़ रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हरीश रावत ने इस्तीफा क्यों दिया, बल्कि यह भी है कि उत्तराखंड की राजनीति में दशकों से सक्रिय ‘हरदा’ का अगला कदम क्या होगा?
क्योंकि पहाड़ की राजनीति में कुछ किरदार पद से बड़े हो जाते हैं—और हरीश रावत उन्हीं किरदारों में गिने जाते हैं।
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