बड़ा अपडेट ;जनवरी 27 तक टल सकता है यूपीआई पर लगने वाला चार्ज…….

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UPI पर 0.4% MDR लागू होने से पहले बड़ा अपडेट, जनवरी 2027 तक टल सकता है नियम; जानिए आम ग्राहक और दुकानदार पर क्या होगा असर

नई UPI व्यवस्था को लेकर बढ़ी हलचल

नई दिल्ली, 8 अक्टूबर 2026। UPI से भुगतान करने वाले करोड़ों लोगों और डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले कारोबारियों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू किए जाने की प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर अब बदलाव की संभावना बन रही है। मर्चेंट संगठनों, फिनटेक कंपनियों और पेमेंट इंडस्ट्री ने इस व्यवस्था को तत्काल लागू करने के बजाय जनवरी 2027 तक टालने की मांग की है।

मामले को लेकर NPCI और वित्त मंत्रालय के बीच चर्चा चल रही है और रिपोर्टों के मुताबिक आने वाले दिनों में इस पर फैसला हो सकता है। हालांकि, जब तक NPCI की ओर से आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आता, तब तक 15 अक्टूबर से लागू होने वाली प्रस्तावित व्यवस्था को टला हुआ नहीं माना जा सकता।

आखिर MDR क्या होता है?

आम लोगों के लिए MDR शब्द थोड़ा तकनीकी है। इसे आसान भाषा में समझें तो Merchant Discount Rate यानी MDR वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान की प्रोसेसिंग के बदले व्यापारी स्तर पर लगाया जाता है।

मसलन, कोई ग्राहक किसी दुकान पर UPI के जरिए बड़ी रकम का भुगतान करता है। ऐसी स्थिति में पेमेंट सिस्टम में लेनदेन को प्रोसेस करने से जुड़ी लागत होती है। प्रस्तावित व्यवस्था इसी लागत को अलग-अलग भुगतान श्रेणियों के हिसाब से निर्धारित करने की दिशा में है।

हालांकि, इसका मतलब यह जरूरी नहीं है कि हर ग्राहक को UPI करते समय अपने फोन की स्क्रीन पर अलग से 0.4 प्रतिशत शुल्क देना होगा। MDR मुख्य रूप से मर्चेंट स्तर की व्यवस्था है। ग्राहक से यह रकम किस तरह वसूली जाएगी या उसका बोझ व्यापारी किस प्रकार वहन करेगा, यह संबंधित भुगतान व्यवस्था और नियमों पर निर्भर करेगा।

2,000 रुपये से ज्यादा के भुगतान पर क्या बदलाव प्रस्तावित है?

प्रस्तावित व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाए जाने की बात है। हालांकि, सभी प्रकार के UPI लेनदेन के लिए एक जैसा नियम नहीं है। अलग-अलग सेवाओं और भुगतान की श्रेणियों के आधार पर अलग शुल्क व्यवस्था प्रस्तावित है।

यही बात पेमेंट कंपनियों और कारोबारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन रही है। उनका कहना है कि केवल शुल्क तय करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पेमेंट सिस्टम को यह सही तरीके से पहचानना भी होगा कि कौन-सा लेनदेन किस श्रेणी में आता है।

15 अक्टूबर से लागू होने से पहले क्यों उठी रोकने की मांग?

मर्चेंट संगठनों और पेमेंट इंडस्ट्री का तर्क है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले बैंकों, पेमेंट एग्रीगेटर्स, दुकानदारों और अन्य संबंधित सिस्टम को तकनीकी तैयारी के लिए पर्याप्त समय चाहिए।

UPI का इस्तेमाल अब केवल दुकानों पर सामान खरीदने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए बिजली-पानी के बिल, बीमा, ऋण की किस्त, रेलवे, ईंधन, ऑनलाइन सेवाओं और अन्य कई प्रकार के भुगतान किए जाते हैं।

ऐसे में हर लेनदेन की सही श्रेणी पहचानना जरूरी होगा। यदि सिस्टम किसी भुगतान को गलत श्रेणी में डाल देता है तो MDR की गणना भी गलत हो सकती है।

लोन की किस्त में सबसे ज्यादा उलझन

इस व्यवस्था को लेकर लोन की किस्त के भुगतान का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। कई बार बैंक खाते से ऑटो-डेबिट के जरिए EMI काटने का प्रयास होता है, लेकिन खाते में पर्याप्त पैसा न होने के कारण भुगतान असफल हो जाता है। इसके बाद ग्राहक खुद UPI के जरिए किस्त का भुगतान कर सकता है।

ऐसी स्थिति में सिस्टम को यह पहचानना होगा कि यह सामान्य UPI ट्रांजैक्शन है या लोन रिपेमेंट। दोनों के लिए अलग शुल्क व्यवस्था होने की स्थिति में सही कैटेगरी की पहचान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

पेमेंट इंडस्ट्री इसी तरह की तकनीकी और परिचालन संबंधी समस्याओं को लेकर अतिरिक्त समय मांग रही है।

त्योहारी सीजन में क्यों बढ़ी चिंता?

अक्टूबर और नवंबर में देश में दिवाली समेत कई बड़े त्योहार होते हैं। इस दौरान बाजारों में खरीदारी बढ़ जाती है और UPI के जरिए बड़ी संख्या में भुगतान किए जाते हैं।

कारोबारियों की चिंता है कि अगर इसी समय डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ती है तो उसका असर उनके कारोबार पर पड़ सकता है। जिन दुकानदारों का मुनाफा पहले से कम है, उनके लिए प्रत्येक लेनदेन पर लगने वाली अतिरिक्त लागत भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

कुछ कारोबारी इस अतिरिक्त लागत को अपनी कीमतों में शामिल कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में अप्रत्यक्ष रूप से इसका असर ग्राहकों पर भी पड़ सकता है।

क्या ग्राहक UPI की जगह नकद या कार्ड इस्तेमाल करने लगेंगे?

इंडस्ट्री की एक चिंता यह भी है कि यदि बड़े UPI भुगतान को लेकर शुल्क की व्यवस्था जटिल या महंगी होती है तो कुछ ग्राहक नकद या कार्ड से भुगतान करना पसंद कर सकते हैं।

हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ऐसा बड़े पैमाने पर होगा। UPI की सबसे बड़ी ताकत इसकी सुविधा और व्यापक स्वीकार्यता है। इसलिए वास्तविक असर नई व्यवस्था लागू होने और उसके व्यवहारिक अनुभव के बाद ही स्पष्ट होगा।

जनवरी 2027 तक टल सकता है नियम?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली प्रस्तावित व्यवस्था जनवरी 2027 तक टल जाएगी?

रिपोर्टों के मुताबिक मर्चेंट संगठनों और पेमेंट इंडस्ट्री की ओर से ऐसा अनुरोध किया गया है और इस विषय पर NPCI तथा वित्त मंत्रालय के बीच बातचीत चल रही है। उद्योग चाहता है कि त्योहारी सीजन के बाद नई व्यवस्था लागू की जाए, ताकि इस दौरान तकनीकी तैयारियां पूरी की जा सकें।

हालांकि, अभी अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। इसलिए 15 अक्टूबर की निर्धारित तारीख को फिलहाल आधिकारिक रूप से बदला हुआ नहीं माना जा सकता। NPCI के अंतिम निर्णय के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

आम जनता के लिए सबसे जरूरी बात

फिलहाल UPI इस्तेमाल करने वाले आम ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है। हर UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगने की बात नहीं है। प्रस्तावित MDR व्यवस्था भुगतान की श्रेणी और लेनदेन की प्रकृति के आधार पर लागू होने वाली है।

इसलिए सोशल मीडिया पर यदि यह संदेश वायरल हो कि “15 अक्टूबर से हर UPI पेमेंट पर 0.4 प्रतिशत चार्ज लगेगा”, तो उसे सीधे सच न मानें। वास्तविक शुल्क व्यवस्था NPCI के आधिकारिक नियमों और संबंधित लेनदेन की श्रेणी पर निर्भर करेगी।

फिलहाल निगाहें NPCI के अगले फैसले पर हैं। यदि नियम जनवरी 2027 तक टाल दिया जाता है तो पेमेंट कंपनियों और कारोबारियों को तकनीकी व्यवस्था तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा और त्योहारी खरीदारी के दौरान अचानक बदलाव से बचा जा सकेगा।

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