
समलैंगिक विवाह को लेकर थाने में हंगामा, दो महिलाओं ने किया हाई वोल्टेज ड्रामा
मेघा तिवारी की रिपोर्ट
मीरजापुर (उत्तर प्रदेश)।
मीरजापुर जिले के कुंदरुफ गांव में बुधवार को समलैंगिक रिश्ते को लेकर एक अनोखा मामला सामने आया, जिसने पुलिस प्रशासन से लेकर गांव के लोगों तक को हैरत में डाल दिया। गांव की एक युवती राधिका और सोनभद्र जिले की अनीता नामक महिला, जो दो बच्चों की मां है, सामाजिक दायरे को लांघते हुए साथ रहने की जिद पर अड़ गईं। इस प्रेम प्रसंग ने तब सनसनी फैला दी जब दोनों अचानक लापता हो गईं और राधिका के परिजनों ने पुलिस से संपर्क साधा।
जांच के दौरान सामने आया कि राधिका अक्सर अपने जीजा के घर घोरावल (सोनभद्र) आती-जाती थी, जहां उसकी अनीता से नजदीकियां बढ़ीं। धीरे-धीरे यह रिश्ता भावनात्मक गहराई तक पहुंच गया और दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खा लीं। अनीता पहले से विवाहित है और उसके दो छोटे बच्चे भी हैं—एक दो वर्षीय बेटा और एक छह माह की मासूम बच्ची।
परिजनों को जब यह बात पता चली तो राधिका के भाई सुरेंद्र ने थाने में तहरीर दी। उसका आरोप है कि अनीता ने उसकी बहन को बहला-फुसलाकर गुमराह किया है और वह उसके भविष्य को बर्बाद कर रही है। हालांकि राधिका ने थाने में साफ तौर पर अनीता के साथ रहने की इच्छा जताई और कहा कि यह उसका निजी निर्णय है।
थाना प्रभारी बली मौर्य ने बताया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच जारी है और कानूनी प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं। पुलिस ने राधिका को दस्तावेजों सहित शनिवार को थाने बुलाया है ताकि उसकी उम्र, मानसिक स्थिति और निर्णय की वैधता को परखा जा सके।
समाजिक दृष्टिकोण और कानूनी पहलू:
यह मामला LGBTQ+ अधिकारों और भारतीय समाज में समलैंगिक विवाह को लेकर व्याप्त मानसिकता के टकराव का उदाहरण है। भले ही भारत में समलैंगिकता अपराध नहीं रही (धारा 377 हट चुकी है), लेकिन समलैंगिक विवाह को अब तक कानूनी मान्यता नहीं मिली है। ऐसे में इस तरह के रिश्ते सामाजिक अस्वीकार्यता और पारिवारिक विरोध के घेरे में आ जाते हैं।
समलैंगिक जोड़ों को न केवल कानूनी सहारा सीमित रूप में मिलता है, बल्कि समाज का दबाव और ताने भी झेलने पड़ते हैं। राधिका और अनीता का मामला भी इसी सामाजिक मानसिकता का शिकार बनता दिख रहा है।
यह प्रकरण सिर्फ एक थाने का मामला नहीं, बल्कि बदलते भारत की तस्वीर है जहाँ नई पीढ़ी अपने निर्णयों पर अडिग है, लेकिन समाज अब भी पुरानी सोच की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, समझदारी और कानून की निष्पक्ष भूमिका सबसे अहम हो जाती है।
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