इस गांव के युवाओं की शादी इस कारण नहीं हो रही, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी इस विधानसभा क्षेत्र के रह चुके हैं विधायक.

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नगला खुशाली: यादव बाहुल्य गांव के हालात बदहाल, पूर्व मुख्यमंत्री का क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं से महरूम

मैनपुरी, 11 जुलाई 2025 | NGV PRAKASH NEWS
मैनपुरी जनपद के करहल विधानसभा क्षेत्र का नगला खुशाली गांव इन दिनों चर्चाओं में है—वजह है सड़क नहीं, शादी नहीं! उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव जिस विधानसभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं, उसी क्षेत्र का यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।

नगला खुशाली गांव घिरोर थाना क्षेत्र में आता है और यादव बाहुल्य आबादी वाला है। गांव की प्रमुख समस्या है—खस्ताहाल सड़क, जो बरसात के मौसम में कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाती है। यह सड़क इतनी जर्जर हो चुकी है कि न तो कोई वाहन चल सकता है और न ही पैदल चलना संभव है। ग्रामीणों की भाषा में कहें तो “सड़क में गड्ढे नहीं हैं, बल्कि गड्ढों में सड़क है।”

शादी का रास्ता रोक रही सड़क

सबसे अजीब और चिंताजनक बात यह है कि इस बदहाल सड़क ने यहां के युवाओं के वैवाहिक जीवन में भी रोड़ा बनकर खड़ा कर दिया है। गांव के 100 से अधिक युवा अब भी कुंवारे हैं, क्योंकि लड़की वाले इस गांव में रिश्ता जोड़ने से हिचकिचा रहे हैं। बरसात में घर तक पहुंचना नामुमकिन होता है और बाहर से आने वालों के लिए यह गांव किसी चुनौती से कम नहीं।

अखिलेश यादव का गढ़, पर हाल बेहाल

यह वही करहल विधानसभा है, जहां से अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। गांव के अधिकांश वोट सपा के पक्ष में जाते हैं—लोकसभा हो या विधानसभा, यहां “साइकिल” ही दौड़ती रही है। बावजूद इसके नगला खुशाली आज भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब खुद अखिलेश यादव विधायक रहे, तब भी इस गांव की हालत नहीं सुधरी तो अब किससे उम्मीद की जाए?

स्कूल भी मर्ज कर दिया गया

गांव में एकमात्र सरकारी स्कूल था, जिसे कुछ साल पहले तीन किलोमीटर दूर एक अन्य विद्यालय में मर्ज कर दिया गया। कारण बताया गया—छात्रों की कम संख्या। लेकिन इसका असर ये हुआ कि अब छोटे बच्चों को दूर स्कूल भेजना अभिभावकों के लिए खतरे और परेशानी से भरा है। खराब रास्ते की वजह से कई बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। ग्रामीणों ने इस मुद्दे पर भी प्रदर्शन किया, लेकिन प्रशासन और प्रतिनिधियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

क्या सिर्फ वोट ही मायने रखते हैं?

नगला खुशाली के लोगों में गुस्सा है, मायूसी भी है। उन्हें लगने लगा है कि नेता सिर्फ चुनाव के वक्त आते हैं, वादे करते हैं और फिर सब भूल जाते हैं। यहां का युवा बेरोजगारी, शिक्षा और अब शादी तक के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की प्राथमिकता सूची में यह गांव कहीं नहीं आता।

अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में नगला खुशाली जैसे गांव सिर्फ नक्शे पर मौजूद रह जाएंगे, हकीकत में नहीं।

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