Gyan Prakash Dubey


24 घंटे में लौटा मासूम – एक भरोसेमंद पुलिस व्यवस्था की जीवंत तस्वीर
हर घर में एक बच्चा होता है जो पूरे परिवार की धड़कन बन जाता है। उसकी हँसी, उसकी शरारतें और उसका मासूम चेहरा, घर के आंगन को मंदिर सा बना देता है। पर सोचिए, अगर वही बच्चा अचानक गायब हो जाए, तो क्या बीतती है उस परिवार पर? बस्ती जनपद के लक्ष्मणपुर गांव में एक ऐसा ही दिन आया, जब 13 वर्षीय कृष्णकांत तिवारी बिना बताए घर से कहीं चला गया।
26 जुलाई की सुबह थी। सुधाकर तिवारी का घर हमेशा की तरह जागा तो ज़रूर, लेकिन बेटे की अनुपस्थिति ने उस सुबह को मनहूस बना दिया। परिवार के लोग पहले कुछ घंटे खुद से लड़ते रहे—कहीं दोस्तों के घर चला गया होगा, या मंदिर में होगा। लेकिन जब दोपहर बीत गई, तो चिंता भय में बदलने लगी। तभी शिवाकर तिवारी ने साहस बटोरकर थाना परसरामपुर का रुख किया।
थाना में जैसे ही रिपोर्ट दर्ज हुई, पुलिस ने इसे सिर्फ एक औपचारिक गुमशुदगी मानने के बजाय एक जिम्मेदारी के रूप में लिया। मु0अ0सं0-231/2025 के तहत मामला दर्ज हुआ और धारा 137(2) B.N.S. के अंतर्गत विधिक कार्यवाही शुरू हुई।
पुलिस की यह लड़ाई एक खोए हुए मासूम को उसके परिवार तक पहुंचाने की थी। उप निरीक्षक झारखंडे पाण्डेय और उनकी टीम जिसमें हे0का0 राघवेंद्र दुबे, हे0का0 राजेश कुमार सिंह, का0 विकास कुमार सिंह, का0 राहुल कन्नौजिया शामिल थे, ने न केवल तकनीक का सहारा लिया, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी अपना हथियार बनाया।
सर्विलांस, सीसीटीवी फुटेज, सोशल मीडिया और मुखबिरों की सहायता से एक-एक कड़ी जोड़ी गई। और फिर 27 जुलाई को अयोध्या के लता मंगेशकर चौराहे से कृष्णकांत को सकुशल खोज निकाला गया।
जब वह छोटा सा बच्चा पुलिस की गाड़ी से उतरकर मां-बाप की बाहों में पहुंचा, तो लगा जैसे पूरी कायनात लौट आई हो। वह दृश्य शब्दों से नहीं, भावनाओं से भरा था। कृष्णकांत को CWC (बाल कल्याण समिति) के माध्यम से कानूनी प्रक्रिया पूरी कराकर परिजनों को सौंपा गया।
पुलिसवालों को देखकर उस परिवार की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं थे, विश्वास था—वो विश्वास जो अब भी जिंदा है, कि जब सब रास्ते बंद हो जाएं, तो एक वर्दी जरूर साथ खड़ी होती है।
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि जब पुलिस मानवता के साथ कर्तव्य निभाती है, तो वह सिर्फ कानून की रक्षक नहीं, समाज की संरक्षक बन जाती है।
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