बुद्ध पूर्णिमा के चमक के बीच उपेक्षा का शिकार, भगवान बुद्ध का जन्म स्थल बस्ती का भुईला डीह…….

Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

बुद्ध पूर्णिमा विशेष: उत्सव की चमक के बीच भुईला डीह की उपेक्षा पर उठते सवाल

👉 अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संभालने में विफल शासन…….

बस्ती, 01 मई 2026.

वैशाख पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान बुद्ध की जयंती पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। ह्ररैया क्षेत्र में स्थित बौद्ध स्तंभ पर भी सुबह से ही लोगों की भारी भीड़ उमड़ी, जहां श्रद्धालुओं ने भगवान बुद्ध को नमन कर शांति और करुणा का संदेश स्मरण किया। लेकिन इसी उत्सव के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल भी है, जो वर्षों से उपेक्षा का शिकार बना हुआ है—गौर ब्लॉक के महुआ डाबर ग्राम सभा के समीप स्थित भुईला डीह।

👉 कितने शर्म की बात है कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को संभालने में सफल हैं…….

बस्ती मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित भुईला डीह एक विशाल पुरातात्विक टीले के रूप में जाना जाता है, जो करीब 70 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और धरातल से 20 से 25 फीट ऊंचा है। इसके चारों ओर फैले पुराने तालाब और संरचनात्मक अवशेष इस स्थान की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व की ओर संकेत करते हैं। स्थानीय स्तर पर यह धारणा लंबे समय से रही है कि यह स्थल प्राचीन कपिलवस्तु से जुड़ा हो सकता है, जहां शाक्य गणराज्य की राजधानी थी और जहां राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने अपने जीवन का प्रारंभिक समय बिताया।

इतिहासकारों के अनुसार, उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक एलेक्जेंडर कनिंघम ने 1874-75 और 1875-76 में इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया था। उनकी रिपोर्ट में भुईला डीह का उल्लेख मिलता है, जहां खुदाई के दौरान 93 से अधिक अवशेष और प्राचीन सिक्के प्राप्त हुए थे। इन तथ्यों के आधार पर उन्होंने इस स्थान को कपिलवस्तु से जोड़ने की संभावना व्यक्त की थी, हालांकि उस समय आधुनिक तकनीकों के अभाव में निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आ सके।

1907 के बस्ती गजेटियर में भी इस स्थल का उल्लेख कपिलवस्तु से संबंधित संभावित स्थान के रूप में किया गया है। खुदाई में मिले अवशेषों को कोलकाता स्थित इंडियन म्यूजियम तथा लंदन के संग्रहालयों में सुरक्षित रखा गया है, जो इसकी ऐतिहासिकता की पुष्टि करते हैं। इसके बावजूद समय के साथ यह स्थान सरकारी और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होता चला गया।

इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 1896 में जर्मन पुरातत्वविद एंटोन फुहरर ने नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र को बुद्ध जन्मस्थल के रूप में स्थापित करने में भूमिका निभाई। इसके बाद नेपाल के तिलौराकोट क्षेत्र को कपिलवस्तु के रूप में व्यापक मान्यता मिल गई। हालांकि इस खोज को लेकर समय-समय पर विवाद भी उठते रहे हैं।

भुईला डीह के समर्थकों का मानना है कि यदि इस स्थल पर आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों—जैसे भू-भौतिकीय परीक्षण और व्यवस्थित उत्खनन—का उपयोग किया जाए, तो इसके ऐतिहासिक महत्व की सच्चाई सामने आ सकती है। महुआ डाबर निवासी शैलेंद्र सिंह, जो वर्षों से इस स्थान के संरक्षण की मांग कर रहे हैं, बताते हैं कि यहां आज भी खेतों की जुताई और तालाबों की खुदाई के दौरान प्राचीन ईंटें, लकड़ी के अवशेष, यहां तक कि मानव कंकाल और पुराने अस्त्र-शस्त्र मिलते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, कपिलवस्तु वही स्थान माना जाता है जहां राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ गौतम ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष बिताए और वैशाख पूर्णिमा की रात ही उन्होंने गृहत्याग कर ज्ञान की खोज का मार्ग चुना। यही सिद्धार्थ आगे चलकर भगवान बुद्ध बने, जिन्होंने पूरी दुनिया को शांति, करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया।

आज जब बुद्ध पूर्णिमा पूरे श्रद्धा भाव से मनाई जा रही है, तब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या हम अपने ही क्षेत्र में मौजूद ऐसे संभावित ऐतिहासिक धरोहरों को नजरअंदाज कर रहे हैं। भुईला डीह जैसे स्थलों का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन न केवल इतिहास को समझने के लिए जरूरी है, बल्कि यह क्षेत्र के पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को भी नई दिशा दे सकता है।

NGV PRAKASH NEWS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *