IGRS का सच :अधिकांश मामलों का निस्तारण केवल कागजो में – जनता को ठगी का एहसास

Gyan Prakash Dubey

आईजीआरएस का सच: कागजों पर निस्तारण, जनता को ठगी का अहसास

👉जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतें दर्ज, समाधान सिर्फ रिपोर्टों में – जमीन पर हालात जस के तस

👉2017 में जनता की समस्याओं के त्वरित निवारण के लिए शुरू हुआ था जनसुनवाई पोर्टल

👉शुरुआत में मिला लाभ, अब अधिकांश शिकायतें सिर्फ कागजों पर ‘निस्तारित’

👉कॉल सेंटर की फीडबैक व्यवस्था भी लगभग ठप

👉किसानों की शिकायतें वर्षों से लंबित, दबंगों और अफसरशाही का बोलबाला

👉थाना समाधान दिवस और संपूर्ण समाधान दिवस भी औपचारिकता बन गए

👉 सबसे ज्यादा शिकायतें राजस्व विभाग से..

👉 निस्तारित ना होने से गांव में होता है खूनी संघर्ष..

आईजीआरएस का सच: कागजों में निस्तारण, जमीनी हकीकत शून्य

2017 में उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासन को जवाबदेह बनाने और आम जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए जनसुनवाई पोर्टल (आईजीआरएस) की शुरुआत की थी। उद्देश्य स्पष्ट था—लोग अपनी समस्याएं ऑनलाइन दर्ज करें, संबंधित विभाग उन पर तुरंत कार्रवाई करे और शिकायतकर्ता को समय पर न्याय मिले।

शुरुआत में यह पोर्टल उम्मीदों पर खरा भी उतरा। समस्याओं का त्वरित निस्तारण हुआ और जनता को लगा कि अब उनकी आवाज सीधे शासन तक पहुंचेगी। लेकिन वक्त गुजरते ही तस्वीर बदल गई। आज हालत यह है कि जनसुनवाई पोर्टल का अधिकांश निस्तारण सिर्फ कागजों पर होता है, जबकि जमीन पर कुछ नहीं बदलता।

कागजी कार्रवाई में सिमटा सिस्टम

कहने को तो हर महीने तीन से चार बार आईजीआरएस की समीक्षा बैठकें होती हैं, लेकिन वे सिर्फ खानापूरी बनकर रह गई हैं। अधिकारी अपनी छवि बचाने के लिए किसी भी शिकायत पर ‘निस्तारित’ की रिपोर्ट लगाकर फाइल बंद कर देते हैं। शासन को रिपोर्ट भेज दी जाती है और सिस्टम संतुष्ट हो जाता है।

फीडबैक सिस्टम भी ठप

शुरुआत में जनसुनवाई कॉल सेंटर शिकायतकर्ता को फोन कर फीडबैक लेता था, लेकिन अब यह भी लगभग बंद हो चुका है। जनता शिकायत करती है, महीनों इंतजार करती है और अंत में खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।

बहादुरपुर ब्लॉक की हकीकत

बहादुरपुर ब्लॉक के एक काश्तकार ने लगभग एक साल पहले जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई थी। उसकी जमीन का कुछ हिस्सा दबंगों ने जोत लिया था और उसने पैमाइश की मांग की थी। आज तक उसकी शिकायत का कोई समाधान नहीं हुआ, न ही किसी ने उससे संपर्क किया।

इसी ब्लॉक के एक और किसान का अनुभव और भी चौंकाने वाला है। उसने भी खेत की पैमाइश के लिए शिकायत दर्ज कराई। विभाग ने अंतिम तिथि को उसे बुलाकर एक पेपर पर हस्ताक्षर करवा लिए और भरोसा दिलाया कि 10 दिनों में पैमाइश होगी। 10 दिन बाद अधिकारी मौके पर आए, निरीक्षण किया और बिना कोई समाधान किए लौट गए। इसके बावजूद पोर्टल पर उसकी शिकायत को ‘निस्तारित’ दिखा दिया गया। किसान को लगातार जानमाल की धमकियां मिल रही हैं, लेकिन सिस्टम की नजर में मामला खत्म हो चुका है।

थाना समाधान दिवस और संपूर्ण समाधान दिवस का हाल

आईजीआरएस की ही तरह, थाना समाधान दिवस और संपूर्ण समाधान दिवस भी अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गए हैं। लोगों की समस्याएं सुनी जाती हैं, आवेदन लिए जाते हैं और फिर कागजों में ही निस्तारण दिखा दिया जाता है।

आईजीआरएस का उद्देश्य था—जनता को न्याय और त्वरित समाधान। लेकिन हकीकत यह है कि यह पोर्टल अब आम जनता के लिए उम्मीद से ज्यादा मायूसी का कारण बन गया है। जब तक अधिकारियों की जवाबदेही जमीन पर तय नहीं होगी, यह सिस्टम सिर्फ कागजी न्याय देता रहेगा।

NGV PRAKASH NEWS

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