अपराध की दुनिया में पुलिस की हिस्सेदारी- पुलिस माफिया गठ+जोड़..

NGV PRAKASH NEWS -Special Report

अपराधियों और पुलिस के गठजोड़ का काला चेहरा: जब कानून के रखवाले ही बन जाते हैं कानून तोड़ने वालों के साथी

07 अक्टूबर 2025

उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में अपराध और पुलिस के गठजोड़ के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। जिन पर नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, वही जब अपराधियों से मिलीभगत कर लेते हैं, तो कानून-व्यवस्था की नींव हिल जाती है। यह गठजोड़ केवल सूचना लीक करने या अपराधियों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई मामलों में पुलिसकर्मी खुद नशे, तस्करी और गैरकानूनी धंधों के संरक्षण में शामिल पाए गए हैं।

कार्रवाई से पहले ही अपराधियों को ‘सूचना’

सबसे गंभीर पहलू यह है कि कई जगहों पर पुलिसकर्मी अपराधियों को छापेमारी या गिरफ्तारी की सूचना पहले ही दे देते हैं, जिससे अपराधी सतर्क होकर सबूत मिटा देते हैं या फरार हो जाते हैं। कई चर्चित मामलों में यही पैटर्न सामने आया है—जांच की शुरुआत होते ही अपराधी गायब, और पुलिस हाथ मलती रह जाती है।

‘हफ्ता’ लेकर चल रहा नशे और अवैध कारोबार का जाल

सूत्रों के अनुसार, कई जगहों पर पुलिस की मिलीभगत से गांजा, भांग, शराब और अन्य नशीले पदार्थों की खुलेआम बिक्री होती है। कई थानों में यह “हफ्ते” के खेल से चलता है — कारोबारियों से तय रकम लेकर स्थानीय पुलिस आंखें मूंद लेती है। नतीजा यह होता है कि मोहल्लों और कस्बों में नशे का जाल गहराता जाता है और कानून व्यवस्था सिर्फ कागजों में दिखती है।

जुआ और देह व्यापार को भी मिलता है ‘संरक्षण’

नशे के अलावा कई इलाकों में खुलेआम जुआखाने और देह व्यापार के अड्डे पुलिस के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं। दिन में छापेमारी की औपचारिकताएं और रात में धंधा फिर शुरू — यह सिलसिला आम हो गया है। स्थानीय लोग शिकायत करते हैं, पर कार्रवाई न के बराबर होती है।

चंदौली का ताजा मामला — गो-तस्करी में पकड़ा गया सिपाही

हाल ही में चंदौली जिले में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने इस गठजोड़ की पोल खोल दी। यहां तैनात सिपाही धर्मेन्द्र यादव को गो-तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि वह बिहार बॉर्डर एरिया में गोवंश से भरी गाड़ियों को पास कराने में तस्करों की मदद करता था। गिरफ्तारी के बाद आरोपी सिपाही ने भागने की कोशिश भी की। यही नहीं, उसके छोटे भाई पर भी पशु तस्करी में लिप्त होने के आरोप पहले से लग चुके हैं। दोनों भाई एक ही जिले में तैनात थे। इस घटना से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और एसपी आदित्य लांघे को कहना पड़ा कि “तस्करी में जो भी संलिप्त होगा, किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”

विकास दुबे से लेकर नशे के धंधों तक — कई उदाहरण

  • कानपुर के कुख्यात विकास दुबे मामले में भी पुलिसकर्मियों पर अपराधियों को सूचना देने और संरक्षण देने के गंभीर आरोप लगे थे।
  • अहमदाबाद और पंजाब में पुलिसकर्मियों की नशीले पदार्थों की तस्करी में संलिप्तता के कई मामले सामने आ चुके हैं।
  • दिल्ली, मुंबई और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जुआ और देह व्यापार के अड्डों को स्थानीय स्तर पर संरक्षण मिलने के तथ्य मीडिया में उजागर हो चुके हैं।

क्यों होता है ऐसा?

विशेषज्ञों के अनुसार, पुलिस और अपराधियों के बीच गठजोड़ के पीछे कई कारण हैं —

  • आर्थिक लाभ: हफ्ता वसूलने से लेकर अपराध से हिस्सा लेने तक।
  • राजनीतिक दबाव: कुछ मामलों में स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों की शह से पुलिस कार्रवाई नहीं करती।
  • कमजोर जवाबदेही: आंतरिक जांच की प्रक्रियाएं धीमी और अक्सर प्रभावहीन होती हैं।
  • भ्रष्ट तंत्र: जहां व्यवस्था में पारदर्शिता और सख्ती नहीं होती, वहां ऐसे गठजोड़ पनपते हैं।

ज़रूरत है पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई की

अपराध और पुलिस के गठजोड़ पर लगाम लगाने के लिए सबसे ज़रूरी है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच की जाए और दोषी पुलिसकर्मियों को उदाहरणात्मक सज़ा दी जाए। टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी, जैसे बॉडी कैमरा, CCTV और स्वतंत्र निगरानी समितियों की भूमिका भी अहम हो सकती है।


अपराधियों और पुलिस के बीच यह छिपा हुआ रिश्ता किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक समस्या है, जो कानून व्यवस्था की साख को खोखला कर रही है। अगर समय रहते इस पर कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो अपराध के खिलाफ लड़ाई खुद ‘अंदर’ से कमजोर पड़ती जाएगी।

📝 NGV PRAKASH NEWS

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