वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर मोदी ने संसद भवन में विपक्ष को घेरा: ममता बनर्जी पड़ी पशोपेश में…

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वंदे मातरम् पर संसद से बंगाल तक सियासी तूफान, ममता बनर्जी घिरती दिखीं — चुनावी माहौल में नया विवाद गरमाया
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नई दिल्ली, 8 दिसंबर 2025।
वंदे मातरम् पर केंद्र और विपक्ष के बीच छिड़ी बहस ने संसद से लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति तक हलचल मचा दी है। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी ममता बनर्जी इस मुद्दे पर ऐसे समय में घिरी हैं, जब बंगाल में चुनावी जमीन पहले से ही गर्म है। बीजेपी आक्रामक मोड में है और टीएमसी भीतर और बाहर दोनों तरफ से दबाव झेल रही है।

क्यों गुस्से में दिखीं ममता?
राज्यसभा के बुलेटिन में सांसदों को ‘जय हिंद’ और ‘वंदे मातरम्’ न बोलने की हिदायत के बाद ममता बनर्जी ने तल्ख प्रतिक्रिया दी— “क्यों नहीं बोलेंगे? वंदे मातरम् हमारा राष्ट्रीय गीत है… जय हिंद हमारा नारा है… इससे जो टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा।”

लेकिन यह बयान सिर्फ एक तस्वीर है। बंगाल की सियासत में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जय हिंद’ दोनों के अलग-अलग मायने हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह विवाद चुनावी समय में न उठा होता, तो ममता की प्रतिक्रिया शायद अलग होती। उनकी नाराजगी में मुस्लिम वोट बैंक की चिंता छिपी हुई है, जबकि बंगाली अस्मिता भी एक बड़ी बाध्यता है।

पीएम मोदी का पलटवार — ‘वंदे मातरम् के साथ विश्वासघात हुआ’
लोकसभा में वंदे मातरम् के 150 साल पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आजादी का प्रेरक सूत्र बताते हुए कहा कि इस गीत के साथ इतिहास में “विश्वासघात” हुआ। उन्होंने 1937 के संदर्भ में कांग्रेस नेतृत्व पर आरोप लगाया कि मुस्लिम लीग के दबाव में वंदे मातरम् को विवादों में घसीटा गया।

पीएम मोदी ने नेहरू की चिट्ठियों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस ने राजनीतिक डर में गीत पर समझौता किया। उन्होंने यह भी कहा कि आज जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, तो नई पीढ़ी को सच जानना चाहिए कि वंदे मातरम् विवाद कैसे खड़ा हुआ।

टैगोर की भूमिका फिर चर्चा में
इंडिया टुडे में छपी ऐतिहासिक व्याख्याओं के हवाले से पीएम के बयान के बाद रवींद्रनाथ टैगोर की राय भी बहस में है। सुभाष चंद्र बोस और नेहरू ने इस गीत पर टैगोर से सलाह ली थी। टैगोर ने मूल गीत के सिर्फ पहले दो छंद रखने का समर्थन किया था और कहा था कि पूरे संदर्भ को पढ़ने पर मुस्लिम समुदाय को आपत्ति हो सकती है, लेकिन शुरुआती दो छंद किसी भी तरह की धार्मिक टकराहट पैदा नहीं करते।

बंकिम चंद्र का घर — नया चुनावी रणक्षेत्र
कोलकाता के प्रताप चटर्जी स्ट्रीट पर स्थित बंकिम चंद्र चटर्जी का घर भी विवाद के केंद्र में है। बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी सरकार ने उनकी स्मृति में बनी लाइब्रेरी की उपेक्षा की है। वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर जब विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी कार्यक्रम करने पहुंचे, तो लाइब्रेरी का गेट नहीं खोला गया।

बंकिम चंद्र के वंशज भी नाराज हैं। परिवार की पांचवीं पीढ़ी के सजल और सुमित्रा चटर्जी ने कहा कि “राज्य सरकार ने कभी यह जानने की भी जरूरत नहीं समझी कि हम कहां हैं।” बीजेपी इस मुद्दे को चुनावी हथियार बना रही है। टीएमसी इसे CPM की पुरानी कमेटियों की लापरवाही बता रही है।

टीएमसी के भीतर बगावत की आग
इसी उथल-पुथल के बीच टीएमसी ने अपने विधायक हुमायूं कबीर को सस्पेंड कर दिया है। कबीर AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन की तैयारी में हैं। उन्होंने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर बेलडांगा में नई मस्जिद की नींव रखी, जिसके बाद विवाद और गहराया।

ममता के सामने यह सीधा संकेत है कि मुस्लिम वोट बैंक में सेंध की कोशिश तेज हो चुकी है। अगर ये वोट खिसकते हैं, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है।

ममता का संकट दो तरफा
वंदे मातरम् पर ममता बनर्जी का विरोध या समर्थन—दोनों उन्हें राजनीतिक मुश्किल में डाल सकते हैं।

  • अगर वे खुलकर समर्थन करती हैं, तो मुस्लिम वोटर नाराज।
  • अगर वे विरोध करती हैं, तो बंगाली अस्मिता और बंकिम चंद्र की धरोहर उनसे छिटक सकती है।

बीजेपी इसी उलझन को मौके में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है।

वंदे मातरम्: इतिहास से लेकर आज की राजनीति तक
1875 में पहली बार प्रकाशित हुआ वंदे मातरम् बंगाल विभाजन के आंदोलन का प्राण माना जाता रहा। बाद में मुस्लिम लीग के विरोध और कांग्रेस की अंदरूनी सियासत में यह गीत लगातार विवादों में घिरता गया। 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिला, लेकिन इसके इतिहास और अर्थ पर राजनीतिक संघर्ष 75 साल बाद भी जारी है।

अब संसद की बहस, प्रधानमंत्री के बयान और बंगाल के चुनावी दर्शकों के बीच यह मुद्दा सिर्फ सांस्कृतिक नहीं, बल्कि एक बड़े सियासी टकराव का केंद्र बन चुका है।

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