NGV PRAKASH NEWS
👉 केंद्र सरकार अपने कोर वोटरों को चेक कर रही है कि क्या आंख मूद कर किसी भी फैसले का वह समर्थन करेंगे…….
👉 सरकार जानती थी कि दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली समिति के द्वारा लागू किए गए इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी | यदि सुप्रीम कोर्ट इन नियमों को खारिज करता है तो वह सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देकर हाथ खड़ा कर लेगी | अन्यथा सारा ठीकरा दिग्विजय सिंह के ऊपर फोड़ दिया जाएगा |

UGC के नए ‘इक्विटी नियम 2026’ पर देशभर में विवाद, सरकार ने दुरुपयोग न होने देने का दिया आश्वासन
नई दिल्ली, 27 जनवरी 2026.
यूजीसी नियमों के पूरे देश में विरोध को देखते हुए बैक फुट पर आई सरकार ने नियमों को लेकर किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को लेकर स्थिति स्पष्ट करेगी |
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को लेकर देशभर में विवाद गहराता जा रहा है। इन नियमों के खिलाफ सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध देखने को मिल रहा है। दिल्ली में प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। बजट सत्र से ठीक पहले इस मुद्दे के राजनीतिक रूप लेने के बीच अब सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।
सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने साफ किया है कि यूजीसी के इन नियमों का किसी भी सूरत में दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि नियमों को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और जल्द ही सभी तथ्यों के साथ विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया जा सकता है। सूत्रों का यह भी कहना है कि विपक्ष बजट सत्र से पहले इस मुद्दे को बड़ा राजनीतिक विषय बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सरकार का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में सभी के लिए सुरक्षित, निष्पक्ष और समान वातावरण सुनिश्चित करना है।
दरअसल, यूजीसी ने ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए प्रावधान लागू किए हैं। इन नियमों के अनुसार, हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य होगा, जो विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों से जुड़ी भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई करेगी और तय समयसीमा में उनका निपटारा सुनिश्चित करेगी। इस कमेटी में एससी-एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी अनिवार्य की गई है। कमेटी का दायित्व कैंपस में समानता का माहौल बनाना और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए योजनाओं को लागू करना बताया गया है।
यूजीसी का तर्क है कि पिछले पांच वर्षों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव की शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019-20 में जहां 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2023-24 में इनकी संख्या बढ़कर 378 हो गई। यूजीसी का कहना है कि यही आंकड़े इन नए नियमों की आवश्यकता को दर्शाते हैं और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों तथा अपनी रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया गया है।
हालांकि, इन नियमों को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों और संगठनों में नाराजगी है। विरोध कर रहे छात्रों का आरोप है कि नियम एकतरफा हैं और इनमें केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के खिलाफ भेदभाव का ही उल्लेख किया गया है, जबकि जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि इन नियमों के तहत झूठी शिकायतों के जरिए सवर्ण छात्रों और शिक्षकों को फंसाने की आशंका है, जिससे कैंपस में तनाव और बढ़ सकता है।
इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि ये नियम यूजीसी अधिनियम और उच्च शिक्षा में समान अवसर की मूल भावना के खिलाफ हैं। याचिका पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है और मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष इस पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया जाएगा।
फिलहाल, एक ओर दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों की सुरक्षा और समानता सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है, तो दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्रों में नियमों के संभावित दुरुपयोग को लेकर डर बना हुआ है। सरकार का कहना है कि सभी भ्रांतियों को दूर किया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि नियमों का इस्तेमाल किसी भी वर्ग के खिलाफ गलत तरीके से न हो। विवाद के बीच अब सभी की नजरें सरकार के विस्तृत स्पष्टीकरण और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।
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