शासन की उपेक्षा का शिकार बस्ती का कपिलवस्तु (भगवान बुद्ध का जन्मस्थान ) भुईलाडीह…….

Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

सरकार की उपेक्षा का शिकार बस्ती का कपिलवस्तु: भुईला डीह और तालाब महुआ डाबर

बस्ती, 1 मार्च 2026.

👉 दी गई जानकारी महुआ डाबर निवासी शैलेंद्र सिंह पुत्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान सिंह के द्वारा दिए गए जानकारी पर तथा अन्य मिले दस्तावेजों पर आधारित……

बस्ती मुख्यालय से लगभग चालीस किलोमीटर दूर गौर प्रखंड के महुआ डाबर ग्राम स्थित भुईला डीह और उसके चारों तरफ विशाल तालाब और उनके अवशेष आज भी अपने भीतर ऐसे ऐतिहासिक संकेत समेटे हुए हैं, जिन पर वर्षों से विद्वानों, शोधकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों के बीच चर्चा होती रही है। लगभग सत्तर एकड़ में विस्तृत यह ऊँचा टीला, जो धरातल से लगभग बीस से पच्चीस फुट ऊपर उठा हुआ है और चारों ओर से जलराशि से घिरा रहा है, प्राचीन कपिलवस्तु से संबंधित मानी जाने वाली परंपराओं के कारण विशेष महत्व रखता है।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक Alexander Cunningham ने सन् 1874-75 तथा 1875-76 में गोरखपुर और मध्य दोआब क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया था। उनकी यात्राओं का विवरण रिपोर्ट ऑफ टूर्स इन द सेंट्रल दोआब एंड गोरखपुर में मिलता है, जिसमें भुईला डीह क्षेत्र का उल्लेख भी दर्ज है। उनकी टीम द्वारा उत्खनन के दौरान 93 अवशेष एवं अनेक प्राचीन सिक्कों को प्राप्त किया था |
उसके आधार पर उन्होंने इसी स्थान को कपिलवस्तु के रूप में चिन्हित किया था | उसे समय कोई एडवांस टेक्नोलॉजी ना मौजूद होने के कारण चक्र की खोज उनके द्वारा नहीं की जा सकी थी | फिर भी उन्होंने अपने शोध के अनुसार 15 किलोमीटर के दायरे में उसके होने की संभावना जाहिर किया था | उनके आसामायिक मृत्यु के कारण आगे की खोज पर वही विराम लग गया |

सन् 1907 के बस्ती गजेटियर में भी इस भूभाग का संदर्भ कपिलवस्तु से जुड़े संभावित स्थलों के रूप में पाया जाता है। उस समय किए गए उत्खनन और सर्वेक्षण में प्राचीन ईंटों के अवशेष, संरचनाओं के चिह्न तथा प्राचीन मुद्राएँ मिलने का उल्लेख मिलता है।

खुदाई में प्राप्त अवशेष तत्कालीन कलकत्ता स्थित Indian Museum में सुरक्षित रखे गए, जबकि कुछ मुद्राएँ इंग्लैंड लंदन स्थित म्यूजियम में रखी गई है जिसके लिखित प्रमाण ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशित जर्नल में मौजूद है, जो इसकी ऐतिहासिकता की ओर संकेत करते हैं।
अंग्रेज सरकार द्वारा कराए गए सर्वेक्षण एवं उत्खनन का नक्शा आज भी उपरोक्त किताब में मौजूद है |

कपिलवस्तु की पहचान को लेकर इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ सन् 1896 में आया, जब जर्मन मूल के पुरातत्वविद् Anton Fuhrer ने जो ( विकिपीडिया के अनुसार उस समय के टॉप 10 जलसाज पुरातत्वविद थे और नकली पुरातत्व के सामानों को बेचने में माहिर माने जाते थे )नेपाल क्षेत्र में लुंबिनी से संबंधित खोजों को प्रमुखता दी। उसी काल में नेपाल के राज परिवार से संबंधित खड़ग शमशेर सिंह और उनके जर्मन सलाहकार जॉर्ज बुहलर लुंबिनी की खोज के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध करवा रहे थे |
उसके बाद दुर्लभ संयोग द्वारा फुहरर खड़ग शमशेर सिंह और उनके रिश्तेदार जसकरण सिंह के खेत में दो चक्र बरामद किया ( जो समझौता फूहरार द्वारा प्लांट कर दिया गया था) और उसी के आधार पर नेपाल में कपिलवस्तु घोषित कर दिया |
चक्र की खोज ने कपिलवस्तु और लुंबिनी की पहचान को नेपाल की ओर स्थापित कर दिया। वर्तमान नेपाल के तिलौराकोट क्षेत्र को कपिलवस्तु के रूप में व्यापक मान्यता प्रदान की।
हालांकि फुहरर को अपमानित होना पड़ा और उन्हें अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था |

इसके बावजूद बस्ती का भुईला डीह स्थानीय जनश्रुतियों और कुछ ऐतिहासिक उल्लेखों के आधार पर कपिलवस्तु से जुड़ा माना जाता रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि टीले की संरचना, चारों ओर सुरक्षात्मक जल-परिधि, विशाल आकार की प्राचीन ईंटें तथा भूमिगत मार्ग जैसे संकेत किसी प्राचीन राजप्रासाद अथवा शाही परिसर की ओर संकेत करते हैं। महुआ डाबर निवासी शैलेंद्र सिंह, जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान सिंह के पुत्र हैं, वर्षों से इस स्थल के पुनः सर्वेक्षण और संरक्षण की मांग करते रहे हैं। उनके अनुसार खेतों की जुताई और तालाब की खुदाई के दौरान आज भी प्राचीन ईंटें, लकड़ी की पुरानी बल्लियाँ, यहाँ तक कि मानव कंकाल और लोहे के अस्त्र-शस्त्र मिलने की घटनाएँ सामने आई हैं।

इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी मानी जाती है, जहाँ राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ गौतम ने युवावस्था तक जीवन व्यतीत किया। बौद्ध परंपरा के अनुसार वैशाख पूर्णिमा की रात्रि, छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, राजकुमार सिद्धार्थ ने गृहत्याग कर सत्य और ज्ञान की खोज का मार्ग अपनाया। यही घटना आगे चलकर विश्व इतिहास में महात्मा बुद्ध के रूप में उनकी प्रतिष्ठा का आधार बनी।
श्रीलंका अखबारों ने भी लिखा है कि
“कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के पुत्र राजकुमार सिद्धार्थ (जिन्हें बस्ती जिले के भुइला से संबद्ध माना जाता है) बचपन से ही वैभव और ऐश्वर्य के वातावरण में पले-बढ़े तथा महल के चारों तरफ स्थित किसी तालाब में वह स्नान भी किया करते थे। उनके जीवन में किसी भी प्रकार की कमी नहीं थी; हर सुख-सुविधा उनके चरणों में उपस्थित थी। मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने विवाह किया।”
“यह 594 ईसा पूर्व (लगभग 2,516 वर्ष पूर्व) की वैशाख पूर्णिमा की रात्रि थी, जब कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के पुत्र राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (जो आगे चलकर बुद्ध कहलाए) ने महान त्याग किया। उन्होंने सांसारिक जीवन का परित्याग इसलिए किया, ताकि वे जन्म-मरण और दुःख के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकें तथा उस परम शांति की खोज कर सकें जो समस्त दुःखों का अंत कर देती है।”

चीनी यात्री व्हेनसॉन्ग द्वारा इसी स्थान को लगभग कपिलवस्तु के रूप में सांकेतिक किया गया था | क्योंकि उस समय कोई सटीक जानकारी देने वाला यंत्र उनके पास नहीं था इसलिए सांकेतिक रूप से बताया गया था |

⏩भुईला डीह के समर्थकों का कहना है कि यदि यहाँ आधुनिक वैज्ञानिक विधियों—जैसे भू-भौतिकीय परीक्षण, विस्तृत उत्खनन और अभिलेखीय पुनरावलोकन—का प्रयोग किया जाए, तो इस स्थल की वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

👉अतीत में नेपाल अंग्रेजो का सहयोगी रहा और उसके नागरिक गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होकर अंग्रेजो के तरफ से लड़ते थे, इसलिये नेपाल को खुश करने के लिये ब्रिटिश सरकार और बाद में भारत सरकार नें भी नेपाल को खुश करने के लिये कपिलवस्तु को नेपाल में ही मान्यता दे रक्खा है |

➡️सन् 2001 में तत्कालीन मंडलायुक्त विनोद शंकर चौबे ने उसे समय के वर्तमान महुआ डाबर के प्रधान शैलेंद्र सिंह के निवेदन पर स्थल का निरीक्षण कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का आश्वासन दिया था, किंतु प्रशासनिक परिवर्तन के बाद यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी।
इस बात को उसे समय के सभी प्रमुख अखबारों ने भी प्रमुखता से छापा था |

📍वर्तमान में स्थिति यह है कि कभी चारों ओर फैला तालाब अतिक्रमण और खेती के कारण सिमटता जा रहा है तथा टीले की ऐतिहासिक परतें धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो रही हैं। इतिहासकारों में कपिलवस्तु की पहचान को लेकर मतभेद अवश्य हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि भुईला डीह एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जिसके समुचित संरक्षण और पुनः वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता है।
💥 भुईला डीह के उद्धार की राह देख रहे महुआ डाबर निवासी और महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान सिंह के पुत्र शैलेंद्र सिंह का कहना है कि आज जब अनेक तरह की अत्यधिक मशीन, एक्स-रे और लेजर तकनीक मौजूद है तो सरकार को चाहिए कि वह इन तकनीकों से इस स्थान का विस्तृत जांच करवाएं और इसकी ऐतिहासिकता को संरक्षित कर इस स्थान को गौरव प्रदान करें |

NGV PRAKASH NEWS के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि इस डीह की ऐतिहासिकता इसी बात से सिद्ध होती है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद भी यहां पर आए थे और यहां के लोगों के साथ मिलकर अपनी रणनीति तय की थी |

उनके अनुसार आज भी चारों तरफ महल की सुरक्षा के लिए जो चौकिया बनाई जाती थी उनके अवशेष मौजूद है | आज भी खेतों की खुदाई पर अनेक लकड़ी के टुकड़े ईट मिलते हैं जो सदियों पुराने दिखाई देते हैं |

उन्होंने अपने प्रधान रहने के समय की एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि वह तालाब की खुदाई करवा रहे थे उसे दौरान चौड़े ईट सीटों से बना लगभग तीन से चार फीट चौड़ा एक रास्ता नजर आया था जो समझौता उस समय महल से आने जाने का रास्ता हुआ करता होगा |

शैलेंद्र सिंह अनेक दस्तावेजों और किदवंतियों को समेटे शायद अंतिम व्यक्ति हैं जो भुईला डीह के ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने तथा उसे पर्यटक स्थल का रूप देने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं|

➡️आज भुईला डीह अपने अतीत के
संभावित प्रमाणों के साथ मौन खड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि शासन और पुरातत्व विभाग इस स्थल की गंभीरता से जाँच कर इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित करें, जिससे न केवल बस्ती अपितु सम्पूर्ण प्रदेश को ऐतिहासिक गौरव की नई पहचान मिल सके।

NGV PRAKASH NEWS

शैलेंद्र सिंह से प्राप्त अनेक दस्तावेजों के फोटो ( इसके अलावा उनके पास अनेक पीडीएफ और अन्य दस्तावेज भी मौजूद है …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *