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इस समय जबकि शासन और प्रशासन ग्रामीण क्षेत्रों में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में अनेक चिकित्सक जो ग्रामीण जनता को प्राथमिक उपचार प्रदान कर रहे हैं, उन्हें सरकार और प्रशासन झोलाछाप नाम देकर उनके ऊपर कार्यवाही कर रहा है | इस स्थिति में इलेक्ट्रो होम्योपैथी का सर्टिफिकेट लेकर अनेक चिकित्सक भी शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र तक में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं |
यहां हम बात कर रहे हैं इलेक्ट्रो होम्योपैथी के कानूनी और न्यायिक पहलुओं पर और 📍इस बारे में हमने बात किया Dr. Y. I. Khan से जो “बोर्ड ऑफ़ इलेक्ट्रो होम्योपैथी ” कानपुर के निदेशक है |
उन्होंने विस्तार से इस बारे में बात किया और इलेक्ट्रो होम्योपैथी के इतिहास और उसके कानूनी पहलुओं पर बताया |
पुरा लेख Dr. Y. I. Khan की बातचीत पर आधारित है…….
भारत में इलेक्ट्रो होम्योपैथी : कानूनी स्थिति, सरकारों का रुख और न्यायालयों के महत्वपूर्ण फैसले
➡️इलेक्ट्रो होम्योपैथी (Electro Homeopathy) एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है जिसकी शुरुआत 19वीं सदी में इटली के वैज्ञानिक काउंट सीजारे मैटेई (Count Cesare Mattei) ने की थी। इस पद्धति में जड़ी-बूटियों से तैयार औषधियों के माध्यम से शरीर की ऊर्जा और रक्त प्रणाली को संतुलित करने का दावा किया जाता है।
भारत में पिछले कई दशकों से इलेक्ट्रो होम्योपैथी का अध्ययन और उपचार पद्धति के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। हालांकि इसकी कानूनी स्थिति लंबे समय तक स्पष्ट नहीं रही। कई बार केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और न्यायालयों के बीच इस विषय को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।
आज भारत में इलेक्ट्रो होम्योपैथी की स्थिति को समझने के लिए केंद्र सरकार की नीति, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्णय तथा विभिन्न राज्यों के कानूनों को देखना आवश्यक है।
📍केंद्र सरकार का रुख
केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा आयुष मंत्रालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी को भारत की आधिकारिक चिकित्सा प्रणालियों (जैसे आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी आदि) की तरह औपचारिक मान्यता प्राप्त नहीं है।
यहां बताते चलें कि तत्कालीन भाजपा नीति सरकार में सुषमा स्वराज उसके पास स्वास्थ्य मंत्रालय था और कथित रूप से इलेक्ट्रो होम्योपैथी के उस समय अनेक संगठन के होने के कारण वह अपनी बात सही रूप से स्वास्थ्य मंत्री के सामने नहीं रख पाए, जिसके फल स्वरुप उसे समय इलेक्ट्रो होम्योपैथी को मानता नहीं मिल पाई जबकि उसके बाद आए हुए चाइनीज पद्धती एक्यूपंक्चर को सरकार ने मान्यता दे दिया |
💥हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार ने पूरे देश में इलेक्ट्रो होम्योपैथी की प्रैक्टिस पर सीधा प्रतिबंध भी नहीं लगाया है, जिसके कारण कई राज्यों में यह वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में यह चल रही है।
📍सुप्रीम कोर्ट की स्थिति
भारत के सुप्रीम कोर्ट में भी इलेक्ट्रो होम्योपैथी से जुड़े कई मामले आए। एक महत्वपूर्ण आदेश में यह कहा गया कि इस पद्धति के अभ्यास पर देशभर में कोई स्पष्ट राष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं है।
( डॉ.मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल मे सुप्रीम कोर्ट इलेक्ट्रो होम्योपैथी के लिए नियम बनाने के लिए निर्देश दिए थे जिससे इस पैथी को मान्यता मिल सके |)
📍सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी चिकित्सा पद्धति को मान्यता देना या उस पर प्रतिबंध लगाना सरकार और संसद का विषय है। अदालत केवल यह देखती है कि कानून और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा।
💥📍💥इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला (2024)
इलेक्ट्रो होम्योपैथी को लेकर हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट का रहा है।
इलाहाबाद/ प्रयागराज हाई कोर्ट नें Rajesh Kumar v. Union of India मामले में 16 मई 2024 को
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ महत्वपूर्ण निर्णय दिया……..
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि:
📍इलेक्ट्रो होम्योपैथी की प्रैक्टिस की जा सकती है।
📍📍लेकिन इस पद्धति का अभ्यास करने वाले व्यक्ति अपने नाम के आगे “डॉक्टर (Doctor)” शब्द नहीं लिख सकते।
केंद्र सरकार ने अभी तक इस पैथी को मान्यता नहीं दी है |
राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे इस विषय में गैर-मान्यता प्राप्त डिग्री और डिप्लोमा जारी करने से रोकें।
📍जब तक कोई सक्षम प्राधिकरण स्पष्ट रूप से प्रतिबंध नहीं लगाता, तब तक इलेक्ट्रो होम्योपैथी को वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में अपनाया जा सकता है।
➡️अदालत ने अपने निर्णय में Sutapa Singh v. State of U.P. मामले का भी हवाला दिया।
विभिन्न राज्यों में इलेक्ट्रो होम्योपैथी की स्थिति
राजस्थान
राजस्थान इलेक्ट्रो होम्योपैथी को लेकर देश का सबसे महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है।
📍📍📍राजस्थान विधानसभा ने “Rajasthan Electropathy System of Medicine Act, 2018” पारित किया, जिसके तहत इस चिकित्सा प्रणाली के विकास, शोध और शिक्षा के लिए एक बोर्ड बनाने का प्रावधान किया गया।
इस कानून के मुख्य उद्देश्य…..
इलेक्ट्रोपैथी चिकित्सा प्रणाली का विकास
प्रैक्टिशनरों का पंजीकरण
शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देना
राज्य स्तर पर नियमन
राजस्थान सरकार ने इस अधिनियम के तहत इलेक्ट्रोपैथी बोर्ड बनाने की प्रक्रिया भी शुरू की, जिससे इस पद्धति को संस्थागत ढांचा मिल सके।
इसी कारण राजस्थान को अक्सर वह राज्य माना जाता है जहां इलेक्ट्रो होम्योपैथी को सबसे अधिक प्रशासनिक समर्थन मिला है।
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में इलेक्ट्रो होम्योपैथी की स्थिति थोड़ी अलग है।
राज्य में आधिकारिक रूप से इसे प्रमुख चिकित्सा प्रणाली का दर्जा नहीं दिया गया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कई स्थानों पर इस पद्धति के अभ्यास को लेकर सख्त प्रतिबंध नहीं है।
ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी के कारण कई वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रैक्टिशनर स्थानीय स्तर पर उपचार देते रहे हैं। इस कारण महाराष्ट्र में इलेक्ट्रो होम्योपैथी का उपयोग ग्रामीण चिकित्सा सेवा के रूप में देखा जाता है।
💥उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रो होम्योपैथी को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद रहे हैं।
2004 में राज्य सरकार ने एक आदेश जारी किया था जिसमें इस पद्धति से संबंधित गतिविधियों पर नियंत्रण की बात कही गई थी।
📍बाद में कई प्रैक्टिशनर अदालत पहुंचे और अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2024 के फैसले में स्पष्ट किया कि:
👉इलेक्ट्रो होम्योपैथी की प्रैक्टिस पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है
👉लेकिन प्रैक्टिशनर अपने नाम के आगे “डॉक्टर” शब्द नहीं लिख सकते
👉 इस विधा के प्रैक्टिशनर, “इलेक्ट्रो होम्योपैथी परामर्श केंद्र” लिख सकते हैं…
निष्कर्ष
भारत में इलेक्ट्रो होम्योपैथी की स्थिति अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
केंद्र सरकार ने इसे औपचारिक चिकित्सा प्रणाली के रूप में मान्यता नहीं दी है।
➡️सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि इसके अभ्यास पर देशभर में कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
📍📍➡️इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2024 में प्रैक्टिस की अनुमति दी लेकिन “डॉक्टर” शब्द के प्रयोग पर रोक लगाई।
📍राजस्थान ने 2018 में इस प्रणाली के लिए कानून बनाकर बोर्ड स्थापित करने की दिशा में कदम उठाया।
📍महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में इसका सीमित अभ्यास जारी है।
इस प्रकार इलेक्ट्रो होम्योपैथी भारत में एक ऐसी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है जिसकी लोकप्रियता तो कई क्षेत्रों में है, लेकिन जिसे अभी तक पूरे देश में एक समान कानूनी और प्रशासनिक मान्यता प्राप्त नहीं हो सकी है।
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