
महंगी होती शिक्षा और सिकुड़ते रोजगार के अवसर: युवाओं के भविष्य पर गहराता संकट
Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS
भारत जैसे युवा देश में शिक्षा और रोजगार को हमेशा विकास की दो मजबूत धुरी माना गया है। लंबे समय तक यह धारणा रही कि बेहतर शिक्षा से बेहतर रोजगार मिलेगा और व्यक्ति तथा समाज दोनों का जीवन स्तर सुधरेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है, जबकि रोजगार के अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पा रहे हैं। परिणामस्वरूप देश के लाखों युवाओं के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
आज उच्च शिक्षा प्राप्त करना केवल ज्ञान अर्जन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक महंगा निवेश बनता जा रहा है। निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की बढ़ती संख्या के साथ शिक्षा का निजीकरण तेजी से बढ़ा है। निजी संस्थानों में पढ़ाई के लिए लाखों रुपये की फीस देनी पड़ती है। इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट या अन्य पेशेवर कोर्स की फीस इतनी अधिक हो चुकी है कि सामान्य और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए इसे वहन करना कठिन होता जा रहा है। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं।
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सरकारी संस्थानों में फीस अपेक्षाकृत कम होती है, लेकिन वहां सीटों की संख्या सीमित है। प्रतियोगिता इतनी कड़ी हो चुकी है कि लाखों छात्र कुछ हजार सीटों के लिए संघर्ष करते हैं। ऐसे में जिन छात्रों को सरकारी संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल पाता, उन्हें मजबूर होकर निजी संस्थानों का रुख करना पड़ता है, जहां फीस कई गुना अधिक होती है। इससे शिक्षा धीरे-धीरे एक महंगी व्यवस्था में बदलती जा रही है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए एक बड़ी बाधा बनती जा रही है।
शिक्षा के महंगे होने का सबसे बड़ा प्रभाव समाज के मध्यम और निम्न वर्ग पर पड़ रहा है। गांवों और छोटे शहरों में रहने वाले लाखों प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। कई छात्र पढ़ाई के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे न केवल व्यक्तिगत स्तर पर नुकसान होता है, बल्कि देश की प्रतिभा भी दब जाती है।
दूसरी ओर, शिक्षा पूरी करने के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं रह गई है। यह स्थिति युवाओं के लिए और अधिक चिंता का विषय बनती जा रही है। लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बेरोजगारी या अल्प रोजगार की स्थिति का सामना कर रहे हैं। कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट जैसी डिग्री हासिल करने वाले युवा भी छोटी-छोटी नौकरियों के लिए आवेदन करने को मजबूर हो जाते हैं।
भारत में बेरोजगारी का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। जनसंख्या के अनुपात में रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाए हैं। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है, जबकि आवेदन करने वाले युवाओं की संख्या लाखों में होती है। एक छोटी सी भर्ती के लिए भी लाखों आवेदन आते हैं और चयन की संभावना बहुत कम रह जाती है।
निजी क्षेत्र में भी रोजगार की स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कई कंपनियां अनुभव की मांग करती हैं, जबकि नए युवाओं के पास अनुभव नहीं होता। इसके अलावा, कई बार कंपनियां कम वेतन पर अधिक काम करवाने की प्रवृत्ति अपनाती हैं। इससे पढ़े-लिखे युवाओं के सामने सम्मानजनक रोजगार पाने की चुनौती और बढ़ जाती है।
महंगी शिक्षा और सीमित रोजगार के अवसरों का एक और गंभीर परिणाम मानसिक तनाव के रूप में सामने आ रहा है। कई युवा लंबे समय तक नौकरी न मिलने के कारण निराशा और हताशा का सामना करते हैं। परिवार की अपेक्षाएं और समाज का दबाव भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। कई बार यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि युवा अवसाद जैसी समस्याओं से जूझने लगते हैं।
इस समस्या के पीछे कई कारण हैं। एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार के बीच संतुलन नहीं बन पाया है। कई कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसे कोर्स कराते हैं जिनकी बाजार में बहुत अधिक मांग नहीं है। परिणामस्वरूप छात्र डिग्री तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनके कौशल उद्योग की जरूरतों से मेल नहीं खाते।
इसके अलावा कौशल आधारित शिक्षा की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। भारत में लंबे समय तक शिक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से सैद्धांतिक ज्ञान पर आधारित रही है। व्यावहारिक और तकनीकी कौशल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। जबकि आधुनिक अर्थव्यवस्था में तकनीकी और व्यावहारिक कौशल की मांग तेजी से बढ़ रही है।
इस चुनौती से निपटने के लिए शिक्षा और रोजगार दोनों क्षेत्रों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। सबसे पहले शिक्षा को अधिक सुलभ और किफायती बनाना जरूरी है। सरकार को सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या और गुणवत्ता दोनों बढ़ानी चाहिए। इससे छात्रों को कम खर्च में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
इसके साथ ही कौशल विकास कार्यक्रमों को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। युवाओं को ऐसे कौशल सिखाए जाने चाहिए जो उद्योग और बाजार की जरूरतों के अनुरूप हों। तकनीकी प्रशिक्षण, डिजिटल कौशल और व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देना समय की मांग है। इससे युवा केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाले भी बन सकते हैं।
स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा देना भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि युवाओं को उचित प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और मार्गदर्शन मिले, तो वे अपने व्यवसाय शुरू कर सकते हैं और दूसरों को भी रोजगार दे सकते हैं। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी।
महंगी होती शिक्षा और सीमित रोजगार के अवसरों की समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विकास से जुड़ा मुद्दा भी है। यदि देश की युवा शक्ति को सही दिशा और अवसर नहीं मिलते, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि शिक्षा और रोजगार की नीतियों को इस प्रकार बनाया जाए कि हर युवा को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।
अंततः यह कहा जा सकता है कि शिक्षा और रोजगार के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। शिक्षा को सुलभ, गुणवत्तापूर्ण और रोजगारोन्मुख बनाना होगा। तभी देश की युवा शक्ति सही मायनों में राष्ट्र निर्माण की दिशा में अपनी भूमिका निभा सकेगी और भारत के विकास का सपना साकार हो सकेगा।
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