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चैत्र नवरात्रि: शक्ति उपासना, आस्था और संयम का महापर्व
भारत की सनातन परंपरा में चैत्र नवरात्रि का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। यह पर्व देवी दुर्गा की आराधना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है।
📍हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवरात्रि की शुरुआत होती है और नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस पर्व के साथ ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी मानी जाती है, इसलिए इसे नई ऊर्जा, नए संकल्प और नई शुरुआत का प्रतीक भी कहा जाता है।
➡️चैत्र नवरात्रि का मूल उद्देश्य शक्ति की उपासना और मन, वचन तथा कर्म की पवित्रता है। मान्यता है कि इन नौ दिनों में देवी दुर्गा की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख, समृद्धि तथा शांति का वास होता है। देवी के नौ स्वरूप—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की क्रमशः पूजा की जाती है।
📍धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दौरान व्रत रखने से शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है। कई लोग पूरे नौ दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु पहले और अंतिम दिन व्रत रखते हैं। व्रत का उद्देश्य केवल भोजन से परहेज करना नहीं होता, बल्कि मन को संयमित रखना, सकारात्मक विचारों को अपनाना और देवी की भक्ति में लीन रहना भी होता है।
➡️नवरात्रि में व्रत रखने के साथ-साथ सात्विक आहार का विशेष महत्व होता है। इस दौरान सामान्य भोजन के स्थान पर फलाहार किया जाता है। फल, दूध, दही, मखाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, साबूदाना, शकरकंद और मूंगफली जैसे पदार्थों का सेवन किया जाता है। फलाहार का उद्देश्य शरीर को हल्का और शुद्ध बनाए रखना होता है ताकि साधना और पूजा में मन एकाग्र हो सके।
📍फलाहार में बनने वाले व्यंजन भी काफी लोकप्रिय होते हैं। कुट्टू की पूरी या पकौड़ी, सिंघाड़े के आटे की रोटी, साबूदाने की खिचड़ी, मखाने की खीर और शकरकंद के व्यंजन विशेष रूप से बनाए जाते हैं। इसके अलावा सेब, केला, पपीता, अनार जैसे फलों का सेवन भी किया जाता है। यह आहार शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ पाचन को भी संतुलित बनाए रखता है।
➡️नवरात्रि के अंतिम दिन अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन नौ कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराकर आशीर्वाद लिया जाता है। इसे शक्ति के सम्मान और समाज में नारी के महत्व को स्वीकार करने की परंपरा के रूप में भी देखा जाता है।
📍आध्यात्मिक दृष्टि से चैत्र नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मअनुशासन और आत्मसुधार का अवसर भी है। इन दिनों में लोग अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों को त्यागकर सकारात्मक ऊर्जा, भक्ति और संयम को अपनाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि यह पर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन में संतुलन और शांति का संदेश भी देता है।
➡️आज के आधुनिक जीवन में भी चैत्र नवरात्रि का महत्व कम नहीं हुआ है। शहरों से लेकर गांवों तक मंदिरों में विशेष पूजा, दुर्गा पाठ, जागरण और भंडारों का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु बड़ी संख्या में देवी मंदिरों में दर्शन के लिए पहुंचते हैं और मां दुर्गा से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
📍इस प्रकार चैत्र नवरात्रि आस्था, संयम और शक्ति उपासना का ऐसा पर्व है जो व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाता है और समाज को सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।
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