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क्रांतिकारी सुरेंद्र पांडेय: संगठन, साहस और समर्पण की अद्भुत गाथा (जन्मदिवस विशेष)
संतकबीरनगर/विशेष, 08 अप्रैल 2026.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे नाम हैं जो मुख्यधारा की चर्चाओं से दूर रह गए, लेकिन जिनका योगदान किसी भी बड़े क्रांतिकारी से कम नहीं रहा। ऐसे ही एक समर्पित, विचारशील और संगठक क्रांतिकारी थे , जिनका जीवन त्याग, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है।
8 अप्रैल 1904 को कानपुर के सचेंडी गांव में जन्मे सुरेंद्र पांडेय ने युवावस्था में ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी। पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में अध्ययन के दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ ‘कानपुर जिमनास्टिक क्लब’ की स्थापना की, जो आगे चलकर क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना।
उनका संपर्क जल्द ही उस दौर के महान क्रांतिकारियों से हुआ, जिनमें , , और जैसे नाम शामिल थे। ये वही दौर था जब देश में सशस्त्र क्रांति के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्ति का विचार तेजी से फैल रहा था।

सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में हुई ऐतिहासिक बैठक में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई, जहां को नई दिशा दी गई। इस संगठन का उद्देश्य केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर करना नहीं, बल्कि एक समाजवादी गणराज्य की स्थापना करना भी था।
लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद क्रांतिकारियों के भीतर आक्रोश और तेज हो गया। इसी क्रम में 17 दिसंबर 1928 को हुई सांडर्स हत्या और 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। इन घटनाओं की योजना और क्रियान्वयन में सुरेंद्र पांडेय जैसे संगठकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।
के दौरान जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने “बहरों को सुनाने के लिए” बम फेंका, तो यह केवल एक विस्फोट नहीं था, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक खुला संदेश था। इस आंदोलन के पीछे काम कर रहे रणनीतिक मस्तिष्कों में सुरेंद्र पांडेय का नाम प्रमुख था।
लाहौर षड्यंत्र केस में उनकी गिरफ्तारी हुई और जेल में रहते हुए उन्होंने राजनीतिक बंदियों के अधिकारों के लिए हुए ऐतिहासिक अनशन में सक्रिय भूमिका निभाई। इस दौरान की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया।
उनका निजी जीवन भी त्याग की मिसाल रहा। जब वे जेल में अनशन कर रहे थे, तब उनकी पत्नी ने भी अन्न-जल त्याग दिया और अंततः उनका निधन हो गया। यह बलिदान उस दौर के क्रांतिकारी परिवारों के अद्वितीय समर्पण को दर्शाता है।
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के में जब चंद्रशेखर आजाद ने अंतिम सांस तक अंग्रेजों से मुकाबला किया, उस समय सुरेंद्र पांडेय भी उनके साथ मौजूद थे। आजाद की शहादत के बाद उन्होंने संगठन को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और विभिन्न जेलों में लंबे समय तक कैद रखा गया।
स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित रहा। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को जागरूक किया और योग व वैदिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
13 जून 1992 को 88 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन आज भी हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल एक शब्द नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों की विरासत है।
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