
रात में खुलता था ऑफिस, सुबह तक चलता था ‘डिजिटल जाल’! लखनऊ में विदेशी नागरिकों को ठगने वाले कथित कॉल सेंटर का भंडाफोड़
लखनऊ, 3 जुलाई 2026।
बाहर से देखने पर यह किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का आधुनिक कार्यालय प्रतीत होता था। कांच की चमचमाती इमारत, सैकड़ों कर्मचारी, अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत और हाई-प्रोफाइल माहौल। लेकिन पुलिस का दावा है कि विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग की 11वीं मंजिल पर चल रहा यह ऑफिस दरअसल विदेशी नागरिकों को निशाना बनाने वाले एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क का हिस्सा था।
क्राइम ब्रांच की छापेमारी में यहां से 119 लोगों को हिरासत में लिया गया। मौके से 100 से अधिक लैपटॉप, 177 से ज्यादा मोबाइल फोन, VoIP सिस्टम, Eyebeam डायलर, डिजिटल स्टोरेज डिवाइस और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड बरामद किए गए हैं। पुलिस ने ऑपरेशन मैनेजर ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार को गिरफ्तार किया है, जबकि पूरे नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड की तलाश जारी है।
शाम 7 बजे शुरू, रात 3 बजे तक चलता था ऑपरेशन
पुलिस के अनुसार, दिन के समय ऑफिस लगभग शांत रहता था, लेकिन शाम ढलते ही गतिविधियां तेज हो जाती थीं। रात 7 बजे से विदेशी नागरिकों को कॉल करने का सिलसिला शुरू होता और सुबह 3 बजे तक चलता था। कर्मचारियों को 25 से 40 हजार रुपये तक मासिक वेतन के साथ कथित तौर पर ठगी से होने वाली कमाई का हिस्सा भी दिया जाता था, जिससे कई लोग हर महीने एक लाख रुपये तक कमा रहे थे।
ऐसे बनाया जाता था विदेशियों को शिकार
जांच में सामने आया है कि गिरोह मुख्य रूप से अमेरिका समेत अन्य देशों के नागरिकों को निशाना बनाता था। ऑनलाइन खरीदारी के बाद रिफंड या तकनीकी सहायता के लिए जब लोग इंटरनेट पर कस्टमर केयर नंबर खोजते थे, तो कथित तौर पर वे इन्हीं जालसाजों तक पहुंच जाते थे।
इसके बाद तकनीकी सहायता के नाम पर उनके कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस लिया जाता, बैंकिंग जानकारी हासिल की जाती और फिर खाते से धनराशि निकाल ली जाती थी। कई मामलों में पीड़ितों को ड्रग तस्करी, आतंकवाद या अन्य गंभीर अपराधों में फंसाने की धमकी देकर डराया जाता था।
चार स्तरों में बंटा था पूरा नेटवर्क
पुलिस के मुताबिक, पूरे रैकेट को अलग-अलग विशेषज्ञ टीमों में बांटा गया था। पहली टीम फर्जी ईमेल, पॉप-अप और संदेश भेजकर लोगों को जाल में फंसाती थी। दूसरी टीम तकनीकी सहायता के नाम पर भरोसा जीतती थी। तीसरी टीम वित्तीय लेनदेन कराती थी, जबकि अंतिम टीम खुद को अमेरिकी जांच एजेंसियों के अधिकारी बताकर पीड़ितों पर दबाव बनाती थी।
डिजिटल अरेस्ट जैसी रणनीतियों का इस्तेमाल कर लोगों को घंटों तक कॉल पर रखा जाता था, ताकि वे किसी अन्य व्यक्ति से मदद न मांग सकें और न ही जानकारी की पुष्टि कर सकें।
देशभर से भर्ती किए गए थे युवा
जांच एजेंसियों का कहना है कि इस कथित कॉल सेंटर में देश के विभिन्न राज्यों से अंग्रेजी में दक्ष युवाओं की भर्ती की गई थी। इनमें असम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के युवक-युवतियां शामिल थीं। पूर्वोत्तर राज्यों की कई युवतियों को विशेष रूप से उनके विदेशी लहजे जैसी अंग्रेजी बोलने की क्षमता के कारण नियुक्त किया गया था।
हालांकि पुलिस का यह भी मानना है कि कई कर्मचारियों को संभवतः इस बात की पूरी जानकारी नहीं थी कि वे जिस संस्था में काम कर रहे हैं, वह कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय साइबर धोखाधड़ी में शामिल है।
करोड़ों रुपये खर्च कर संचालित हो रहा था नेटवर्क
पुलिस के अनुसार, समिट बिल्डिंग में किराया, मेंटेनेंस और अन्य खर्चों को मिलाकर इस पूरे ऑपरेशन पर सालाना लगभग तीन करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे थे। पिछले एक वर्ष से यह गतिविधि लगातार संचालित हो रही थी।
विदेशी एजेंसियों से प्राप्त इनपुट और शिकायतों के आधार पर लखनऊ पुलिस ने कार्रवाई की। एडीसीपी (क्राइम) किरण यादव के अनुसार, यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क का हिस्सा प्रतीत होता है और फरार आरोपियों की तलाश के लिए कई टीमें लगातार काम कर रही हैं।
फिलहाल जब्त किए गए सभी डिजिटल उपकरणों की फोरेंसिक जांच जारी है, जिसके बाद इस पूरे नेटवर्क के और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
NGV PRAKASH NEWS