NGV PRAKASH NEWS

बस्ती पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल, आखिर क्यों धूमिल हो रही खाकी की छवि?
बस्ती.
जनपद में पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार उठ रहे सवाल अब आम जनता के बीच चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। कहीं सड़क पर दरोगा के कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल होने की बात सामने आ रही है, तो कहीं होटल में खाना खाने के बाद मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इन घटनाओं ने पुलिस की कार्यशैली और उसकी छवि को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर क्या वजह है कि आम जनता के मन में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भरोसा कमजोर होता जा रहा है? क्या रिश्वतखोरी अब व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है या फिर कुछ लोगों की कथित कार्यशैली पूरे विभाग की छवि खराब कर रही है?
थानों के आसपास सौदेबाजी के आरोप, कार्रवाई पर सवाल
चर्चा तो यहां तक है कि कुछ थाना क्षेत्रों में थानों के आसपास स्थित चाय की दुकानों पर मामलों को रफा-दफा कराने के नाम पर कथित सौदेबाजी होती है। यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है तो यह पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है। आखिर थाने के आसपास ही इस तरह की गतिविधियों की चर्चा क्यों हो रही है और जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लग रही?
नशे के कारोबार पर भी उठ रहे सवाल
जनपद के कई थाना क्षेत्रों में छोटी-छोटी दुकानों और अन्य स्थानों पर कथित तौर पर नशीले पदार्थों की बिक्री की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। आम लोगों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर लोगों को इन गतिविधियों की जानकारी रहती है, लेकिन सवाल यह है कि संबंधित पुलिस को इसकी जानकारी क्यों नहीं होती? क्या पुलिस की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर हो गई है या फिर कहीं न कहीं कथित मिलीभगत के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?
लोगों के बीच व्यंग्य में यह चर्चा भी होती है कि कहीं इस व्यवस्था पर ‘विटामिन एम’ यानी मनी का असर तो नहीं है?
सत्ता पक्ष के विधायक के आरोपों ने बढ़ाई चिंता
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्ता पक्ष के विधायक भी एक प्रभारी निरीक्षक पर रिश्वत लेने और आम जनता के साथ दुर्व्यवहार करने जैसे गंभीर आरोप सार्वजनिक रूप से लगा रहे हैं। जब जनप्रतिनिधियों की ओर से ही इस तरह के आरोप सामने आने लगें तो पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
हालांकि, इन आरोपों की निष्पक्ष जांच और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई होना जरूरी है, लेकिन ऐसे आरोपों का लगातार चर्चा में रहना भी विभाग की छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
थानों में फरियाद लेकर जाने से क्यों डरती है आम जनता?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि आम नागरिकों के मन में यह धारणा बनती जा रही है कि पुलिस विभाग में बिना पैसे दिए काम नहीं होता। कई लोग तो थाने जाने से भी कतराते हैं। उन्हें डर रहता है कि अपनी समस्या लेकर पहुंचने पर कहीं उनकी ही बात को गलत न ठहरा दिया जाए या उन्हें ही किसी परेशानी में न डाल दिया जाए।
आम लोगों के बीच दबी जुबान से यह शिकायत भी सुनने को मिलती है कि जो काम पहले एक हजार रुपये में हो जाता था, अब कथित तौर पर दस हजार रुपये देने के बाद भी नहीं हो पा रहा है। यह केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था के प्रति लोगों में पनपते अविश्वास की ओर इशारा करती है।
आखिर जवाबदेह कौन?
पुलिस का मूल उद्देश्य जनता की सुरक्षा करना, पीड़ितों को न्याय दिलाना और कानून का राज स्थापित करना है। खाकी वर्दी की असली ताकत उसका रुतबा नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। यदि यही विश्वास कमजोर होने लगे तो यह किसी भी पुलिस व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
अब सवाल यह है कि क्या पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इन शिकायतों और वायरल वीडियो का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएंगे? क्या थानों की कार्यप्रणाली, पुलिसकर्मियों के आचरण और नशे के कथित कारोबार पर प्रभावी निगरानी की जाएगी? क्या आम जनता को बिना किसी दबाव और बिना किसी अवैध लेन-देन के न्याय मिल सकेगा?
बस्ती पुलिस के जिम्मेदार अधिकारियों को अब आत्ममंथन करने की जरूरत है। कुछ पुलिसकर्मियों की कथित गलत कार्यशैली के कारण पूरे विभाग की छवि पर सवाल खड़े होना दुर्भाग्यपूर्ण है। ईमानदार पुलिसकर्मियों का सम्मान तभी सुरक्षित रह सकता है, जब भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के आरोपों पर निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
आखिर कब सुधरेगी बस्ती पुलिस की कार्यप्रणाली और कब आम आदमी के मन में खाकी के प्रति फिर से विश्वास कायम होगा?
NGV PRAKASH NEWS