
दिल्ली का मुस्तफाबाद रविवार को सिसक उठा… एक ही गली में जब 10 जनाजे आए, तो हर आंख नम थी, हर दिल बोझिल
दिल्ली।
मुस्तफाबाद की गली नंबर दो की वो शाम शायद कभी भूलाई नहीं जा सकेगी। चार एंबुलेंस एक-एक कर जब उस तंग सी गली में दाखिल हुईं, तो गली के हर कोने से एक ही सवाल उठ रहा था—”इतना बड़ा ग़म… एक ही घर के हिस्से क्यों आया?”
इन एंबुलेंस में 10 जनाजे थे—तीन मासूम बच्चों के, बाकी बड़ों के। मगर हर जनाजे पर एक ही चादर थी—ख़ामोशी, दर्द और टूटे हुए सपनों की।
घर टूटा, तो बिखर गईं ज़िंदगियाँ
सबसे पहला जनाजा था मकान मालिक तहसीन का… फिर उनके बेटे नाजिम का… फिर दो बहुएं चांदनी और शाहीन, पोती आफरीन, पोते अनस और आठ महीने का अफ्फान… और किरायेदार दानिश, नावेद और रेशमा का जनाजा भी उसी कतार में था।
किसी ने कहा—”ये तो पूरी एक मोहब्बत भरी दुनिया थी, जो एक ही पल में खामोश हो गई…”
शव जैसे ही एंबुलेंस से बाहर निकाले गए, औरतें फूट-फूटकर रो पड़ीं। कुछ की चीखें ज़मीन तक जा रहीं थीं, कुछ की आसमान तक।
इतनी भीड़, इतनी खामोशी… और एक सवाल
जनाजे की नमाज़ के लिए मस्जिद छोटी पड़ गई। फिर पहली बार, मुस्तफाबाद की ईदगाह को ये जिम्मा सौंपा गया। करीब दो हजार लोग उस आख़िरी सफर में शामिल हुए। लोग न सिर्फ़ रो रहे थे, बल्कि खुद से ये भी पूछ रहे थे—”किस गुनाह की ये सज़ा थी?”
जिन्हें बच जाना था, वो बस देख रहे थे टूटती दुनिया
तहसीन का बेटा ‘चांद’—जो इस हादसे में जिंदा बचा, उसका चेहरा एक पिता का था, एक भाई का था, एक बेटा था… और सबसे ज़्यादा—एक टूटी हुई आत्मा का।
चांद की आंखों में सिर्फ आँसू नहीं थे, उसमें घर का मलबा था, अपने खोए हुए अपनों की परछाइयाँ थीं।
इशहाक—तहसीन के ससुर—जो रमज़ान में बेटी के घर आए थे, इस हादसे में वो भी नहीं रहे। उनका जनाजा लोनी ले जाया गया।
अब इस घर में क्या बचा है…?
तहसीन के परिवार में अब सिर्फ़ उनकी पत्नी जीनत, बेटा चांद, एक बहू और पाँच मासूम बच्चे बचे हैं। वो मकान जिसमें एक वक्त रोटियाँ पकती थीं, अब वहां सन्नाटा पसरा है।
लोगों ने दुकानें बंद कीं, बाजार नहीं सजा
मुस्तफाबाद के पुराने 25 फुटा रोड पर हर रविवार जो बाजार सजता था, इस बार वहां सन्नाटा था। पटरी वालों को पहले ही मना कर दिया गया था। क्योंकि उसी रास्ते से जनाजे आने थे। और जब जनाजे गुज़रे, तो हर दुकान की शटर झुकी थी—शायद इंसानियत ने अपना सिर झुका रखा था।
शव ले जाने के लिए भी नहीं थे पैसे…
जीटीबी अस्पताल में पोस्टमार्टम के बाद जब शव घर लाने की बारी आई, तो परिवार ने कहा—”हमारे पास एंबुलेंस का किराया तक नहीं है…”
छह सौ रुपये भी भारी लगने लगे थे, क्योंकि उनका सबकुछ तो मलबे में दब चुका था। परिजन बेबस थे, और प्रशासन—खामोश।
फिर फरिश्ता बनकर आए पद्मश्री शंटी
जब ये खबर पद्मश्री जितेंद्र सिंह शंटी तक पहुंची, तो वो खुद चार बड़ी एंबुलेंस लेकर पहुंचे और बिना कोई पैसा लिए सभी शव मुस्तफाबाद पहुंचवाए।
शंटी सिर्फ़ एक नाम नहीं है, वो उस वक्त इंसानियत का दूसरा नाम बन गए।
NGV PRAKASH NEWS

