
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल: भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापारिक प्राथमिकता और रणनीतिक संतुलन
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति में व्यापारिक हितों को सर्वोपरि रखा गया है। भारत-अमेरिका संबंधों में भी यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है, जहाँ परंपरागत रणनीतिक साझेदारी की जगह लेन-देन आधारित दृष्टिकोण ने ले ली है।
🇮🇳 भारत-अमेरिका व्यापार: ‘मिशन 500’ और टैरिफ विवाद
🔄 ट्रंप की ‘लेन-देन’ कूटनीति
⚠️ रणनीतिक साझेदारी में चुनौतियाँ
🧳 आव्रजन और मानवाधिकार मुद्दे
🧠 प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल: भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापारिक प्राथमिकता और रणनीतिक संतुलन
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति पहले से कहीं अधिक व्यापार-केंद्रित हो गई है। ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को नए सिरे से लागू करते हुए ट्रंप ने हर द्विपक्षीय संबंध को एक व्यापारी सौदे की तरह देखा — जिसमें लाभ और हानि का गणित सर्वोपरि रहा। भारत के साथ अमेरिका के संबंध भी इस नजरिए से अलग नहीं हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार: ‘मिशन 500’ और टैरिफ विवाद
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई शिखर बैठक में द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया, जिसे ‘मिशन 500’ नाम दिया गया। लेकिन इसी दौरान ट्रंप ने भारत को “टैरिफ किंग” कहकर आलोचना की और भारतीय स्टील, एल्युमिनियम, फार्मास्युटिकल्स और ऑटो पार्ट्स पर उच्च टैरिफ लगाने शुरू कर दिए। भारत ने जवाबी रणनीति अपनाई और कुछ अमेरिकी कृषि उत्पादों के टैरिफ में कटौती करते हुए बाजार पहुँच की पेशकश की, जिससे कुछ संतुलन बना।
ट्रंप की ‘लेन-देन’ कूटनीति
ट्रंप की विदेश नीति मूलतः ‘डील मेकिंग’ पर आधारित रही। उन्होंने हर रिश्ते को इस आधार पर परखा कि अमेरिका को उससे क्या मिल रहा है। भारत के साथ रिश्ते भी इसी चश्मे से देखे गए। रक्षा खरीद हो या निवेश अवसर — ट्रंप ने उन देशों को महत्व दिया, जो अमेरिका से ज़्यादा खरीद करते हैं या व्यापार घाटा कम करते हैं।
रणनीतिक साझेदारी में चुनौतियाँ
हालांकि भारत को ट्रंप प्रशासन ने इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत चीन के खिलाफ एक अहम रणनीतिक भागीदार माना, परंतु व्यापारिक असंतुलन, रूस से भारत की रक्षा साझेदारी, और ईरान से भारत के रिश्तों ने इस रणनीतिक संबंध को बार-बार चुनौती दी। अमेरिका चाहता था कि भारत रूस से S-400 जैसे हथियार न खरीदे, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता था।
आव्रजन और मानवाधिकार मुद्दे
ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीति भारत के आईटी पेशेवरों और छात्रों पर प्रतिकूल असर डालती रही। H-1B वीजा प्रक्रिया को कठिन बनाया गया। फरवरी 2025 में 104 भारतीय नागरिकों को अमेरिका से निर्वासित किया गया, जिसमें उन्हें हथकड़ी पहनाकर भेजा गया। भारत में इस पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई और अमेरिकी प्रशासन की छवि प्रभावित हुई।
प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग
ट्रंप ने भारत को रक्षा सहयोग के क्षेत्र में अमेरिका का ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित कर दिया था। उन्नत सैन्य उपकरणों की बिक्री, जैसे F-21 लड़ाकू विमान, ड्रोन, और समुद्री निगरानी तकनीक — सब भारत को प्रस्तावित किए गए। साथ ही, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में भी अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर काम करने की इच्छा जताई।
निष्कर्ष
डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल भारत-अमेरिका संबंधों के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आया। एक ओर जहाँ रक्षा और प्रौद्योगिकी में साझेदारी बढ़ी, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक नीतियों और कूटनीतिक लचीलेपन की कमी ने रिश्तों में खटास भी पैदा की। भारत के लिए चुनौती यही रही कि वह अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखे और बहुपक्षीय हितों का संतुलन साधे।
(NGV PRAKASH NEWS)

