

2030 तक ब्रेस्ट कैंसर होगा खत्म? देसी वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार की वैक्सीन से उम्मीद की नई किरण
नई दिल्ली।
ब्रेस्ट कैंसर से जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी करामाती वैक्सीन तैयार की है, जो न केवल ब्रेस्ट कैंसर को रोकने में सक्षम है, बल्कि उसका इलाज भी कर सकती है। सबसे खास बात यह है कि इस क्रांतिकारी वैक्सीन के पीछे एक भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अमित कुमार का बड़ा योगदान है। दावा है कि अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चला तो 2030 तक ब्रेस्ट कैंसर का अंत संभव है।
पहली बार ब्रेस्ट कैंसर पर असरदार टीका
न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस वैक्सीन का पहला क्लिनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है। ट्रायल में भाग लेने वाली 75% से अधिक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ मजबूत इम्यून प्रतिक्रिया देखी गई है। कुल 35 महिलाओं को वैक्सीन दी गई, जिनमें अधिकतर को ट्रिपल नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर था—जो कि स्तन कैंसर का सबसे घातक प्रकार माना जाता है। हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली ने इसी प्रकार के कैंसर की आशंका के चलते 37 साल की उम्र में दोनों स्तनों की सर्जरी करवा ली थी।
साइड इफेक्ट्स नाममात्र, असर दमदार
परीक्षण के दौरान महिलाओं के शरीर में वैक्सीन के प्रति एंटीबॉडीज़ बन रही हैं या नहीं, इसे जानने के लिए समय-समय पर उनके खून की जांच की गई। परिणाम चौंकाने वाले थे—टीका लगवाने वाली महिलाओं को सिर्फ इंजेक्शन वाली जगह पर हल्की जलन का अनुभव हुआ, अन्य कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं देखा गया।
अनिक्सा बायोसाइंसेज़ और अमेरिका के प्रतिष्ठित क्लीवलैंड क्लिनिक के संयुक्त प्रयास से विकसित की जा रही इस वैक्सीन के अगले चरण का परीक्षण 2026 में शुरू होगा, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं और ब्रेस्ट कैंसर के विभिन्न रूपों को शामिल किया जाएगा।
क्यों इतना कठिन है कैंसर के खिलाफ वैक्सीन बनाना?
डॉ. अमित कुमार ने बताया कि किसी संक्रमण (इंफेक्शन) की वैक्सीन बनाना अपेक्षाकृत आसान होता है क्योंकि वायरस या बैक्टीरिया शरीर के बाहर भी मौजूद रहते हैं, लेकिन कैंसर की कोशिकाएं शरीर के भीतर, शरीर की अपनी ही कोशिकाओं से बनती हैं, जिससे प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें पहचान नहीं पाता।
अब तक की वैक्सीनों में कैंसर कोशिकाओं से जुड़े प्रोटीनों को निशाना बनाया गया, लेकिन वे प्रोटीन सामान्य अंगों में भी पाए जाते थे, जिससे हेल्दी सेल्स को नुकसान हुआ। मगर इस नई वैक्सीन में लक्ष्य है अल्फा-लैक्टालब्यूमिन नामक प्रोटीन, जो केवल महिलाओं में गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान बनता है। यानी सामान्य समय में यह शरीर में नहीं होता — इसलिए टीका केवल कैंसर कोशिकाओं को ही निशाना बनाता है।
20 साल पुराना आइडिया अब दे रहा है फल
20 साल पहले क्लीवलैंड क्लिनिक के एक वैज्ञानिक ने सुझाव दिया था कि जिन महिलाओं को और बच्चे नहीं चाहिए, उन्हें इस विशेष प्रोटीन के खिलाफ टीका दिया जाए। इसी सिद्धांत के आधार पर अनुसंधान की शुरुआत हुई। अब यह शोध अमेरिका के रक्षा विभाग की आर्थिक मदद से आगे बढ़ रहा है।
डॉ. कुमार ने आशा जताई है कि अमेरिका में हो रहे सरकारी बजट कटौती का इस प्रोजेक्ट पर असर नहीं पड़ेगा और 2030 तक ब्रेस्ट कैंसर को वैसा ही अंत मिलेगा जैसा हमने पोलियो या चेचक जैसी बीमारियों के खिलाफ देखा है।
भारत में स्थिति चिंताजनक, पर आशा की किरण
हर साल भारत में लगभग 98,000 महिलाओं की मौत ब्रेस्ट कैंसर से होती है। दुनियाभर में यह संख्या करीब 6.7 लाख है। ऐसे में अगर यह वैक्सीन बड़े पैमाने पर सफल होती है तो भारत जैसी जनसंख्या वाले देश में यह जीवन रक्षक साबित हो सकती है।
यह वैक्सीन न केवल चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति ला सकती है, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक पर निर्णायक जीत भी दिला सकती है।
रिपोर्ट: NGV PRAKASH NEWS
