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बलिया में गंगा का कहर: दो मिनट में भरभराया कटरा, 17 मकान और डेढ़ दर्जन दुकानें गंगा में समाईं
बलिया, 14 सितम्बर 2025।
गंगा के कटान ने बलिया जिले की बैरिया तहसील स्थित नदी पार की पंचायत के चक्की-नौरंगा गांव को एक बार फिर तबाह कर दिया। शनिवार को देखते ही देखते 17 मकान और बाजार का एक दो मंजिला कटरा नदी में समा गया। कटरे में करीब डेढ़ दर्जन दुकानें थीं। यह इस साल की बाढ़ से अब तक की सबसे बड़ी क्षति मानी जा रही है। अब तक कुल 116 मकान गंगा की लहरों में विलीन हो चुके हैं।
अफरा-तफरी और भय का माहौल
शनिवार सुबह से ही गंगा का कटान लगातार तेज होता गया। आठ बजे के बाद नदी की धार सीधी आबादी की ओर मुड़ गई और उमाशंकर साह, भोला ठाकुर, राधेश्याम ठाकुर, संतोष ठाकुर, विकाश ठाकुर, प्रदीप कुमार राम, राजेन्द्र राम, हीरामन राम, गोगा राम, रामचंद्र, कमलेश, छोटक, शिवनरायन, रामजीत, शिवाधार, एकराम और संतोष कुमार के कच्चे-पक्के मकान पलक झपकते ही ढह गए।
बस्ती में अफरा-तफरी मच गई। लोग नावों के सहारे अपने-अपने सामान और परिवार को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कोशिश करते रहे। ग्रामीणों का आरोप है कि आपदा के इस भयावह समय में प्रशासन की निष्क्रियता पीड़ा को और बढ़ा रही है।
बाजार का उजड़ना, यादों में सिमट जाएगा चक्की-नौरंगा
गांव के बीचोंबीच मौजूद चक्की-नौरंगा बाजार इस इलाके की धड़कन था। शनिवार को गंगा की धार ने इसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा लील लिया। भोला ठाकुर का दो मंजिला कटरा, जिसमें 17 दुकानें थीं, महज दो मिनट में भरभराकर नदी में समा गया। निचले तल पर 10 और ऊपरी तल पर 7 दुकानें थीं। सौभाग्य से दुकानदार पहले ही सामान निकाल चुके थे, जिससे बड़ी आर्थिक क्षति से बचाव हो सका।
ग्रामीणों के अनुसार यह बाजार महिलाओं के लिए भी सुविधाजनक था। यहां खेती-किसानी से जुड़े सामान से लेकर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएं तक उपलब्ध रहती थीं। शाम को यह जगह सामाजिक मेलजोल और राजनीतिक बहस का केंद्र होती थी, लेकिन अब सिर्फ स्मृतियां ही बाकी रह गई हैं।
सुरक्षात्मक ठोकर ढही, अब सीधे आबादी पर वार
स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले मलिन बस्ती का कुआं और बिहार स्थित जेवईनिया इंटर कॉलेज गंगा की धार को रोकने का काम करते थे। दोनों संरचनाओं के नदी में विलीन होने के बाद कटान और तेज हो गया है। अब लहरें सीधे लगभग सौ मीटर आबादी पर टकरा रही हैं, जिससे नुकसान की गति कई गुना बढ़ गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर तत्काल प्रभाव से ठोस रोकथाम के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले दिनों में पूरा चक्की-नौरंगा गांव इतिहास का हिस्सा बन जाएगा।
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