Gyan Prakash Dubey

देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाला ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बस्ती जिला, जो इतिहास में भगवान राम के राजगुरु महर्षि वशिष्ठ मुनि की जन्मस्थली है |
अनेक पौराणिक महत्व को धारा में सजोयें हुये है |
देश के आजाद होने के बाद आज तक वर्तमान केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों को छोड़कर लगभग हर सरकार में बस्ती जिले का मंत्री परिषद में प्रतिनिधित्व रहा | वह बस्ती जिला देश के आजाद होने के 75 वर्षों बाद आज हर तरफ से पिछड़ा हुआ है |
👉राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद विकास से पीछे क्यों रह गया बस्ती?
पूर्वांचल का ऐतिहासिक जिला बस्ती लंबे समय से एक विरोधाभास का गवाह बना हुआ है। एक ओर यहां से कई नेता उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं, वहीं दूसरी ओर जिला आज भी बुनियादी विकास के कई पैमानों पर पिछड़ा नजर आता है। यह सवाल अब केवल आम जनता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक और बौद्धिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है कि आखिर राजनीतिक मौजूदगी के बावजूद बस्ती को उसका हक क्यों नहीं मिल पाया।
बस्ती की भौगोलिक स्थिति इस बहस को और गहरा करती है। जिला एक तरफ गोरखपुर और दूसरी ओर अयोध्या जैसे बड़े और अत्यधिक विकसित होते शहरों के बीच स्थित है। गोरखपुर वर्तमान मुख्यमंत्री का गृह जनपद है, जहां पिछले कुछ वर्षों में आधारभूत ढांचे, मेडिकल सुविधाओं, कनेक्टिविटी और शहरी विस्तार में अभूतपूर्व तेजी देखी गई। वहीं अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि परियोजना के बाद पूरी तरह बदल चुकी है। सड़क, रेल, हवाई अड्डा, पर्यटन और धार्मिक आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अयोध्या ने एक नया स्वरूप ले लिया है।
इन दोनों विकासशील केंद्रों के बीच बस्ती की स्थिति ऐसी बन गई है, जैसे वह विकास की मुख्यधारा से कट गया हो। यह वही स्थिति है जैसी लखनऊ और कानपुर के बीच उन्नाव की रही है या लखनऊ और अयोध्या के बीच बाराबंकी की। बड़े शहरों के आसपास बसे जिलों का विकास अक्सर महानगरों में ही सिमट कर रह जाता है और बीच के जिले योजनाओं के नक्शे पर केवल transit zone बनकर रह जाते हैं।
बस्ती के मामले में यह स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है क्योंकि यहां से प्रतिनिधित्व करने वाले नेता सत्ता के गलियारों तक पहुंचे हैं। बावजूद इसके जिले में न तो बड़े औद्योगिक निवेश आए, न ही उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में कोई ठोस मॉडल विकसित हो सका। मेडिकल कॉलेज और कुछ सड़क परियोजनाओं को छोड़ दिया जाए तो बस्ती आज भी बेहतर रेलवे कनेक्टिविटी, औद्योगिक कॉरिडोर, आईटी या टेक्निकल संस्थानों जैसी सुविधाओं से वंचित दिखाई देता है।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा का विषय है कि विकास की योजनाएं या तो कागजों में सिमट कर रह गईं या फिर उनका लाभ जिले की सीमाओं को पार कर गया। गोरखपुर और अयोध्या जैसे शहरों को केंद्र बनाकर बनाई गई योजनाओं में बस्ती को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिली। परिणामस्वरूप यहां के युवाओं को शिक्षा और रोजगार के लिए आज भी बाहर पलायन करना पड़ता है।
यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि महानगरों और बड़े धार्मिक या राजनीतिक केंद्रों के आसपास के जिले अक्सर “बीच में पिसने” की स्थिति में आ जाते हैं। बस्ती इसका जीवंत उदाहरण बनता जा रहा है। विकास की रफ्तार दोनों ओर तेज है, लेकिन बस्ती उस धारा में बहने के बजाय किनारे खड़ा दिखाई देता है।
अब जरूरत इस बात की है कि बस्ती को केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्व दिया जाए। जिले के लिए अलग से औद्योगिक नीति, शिक्षा और स्वास्थ्य के विशेष केंद्र, बेहतर परिवहन नेटवर्क और स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास मॉडल तैयार किए जाएं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल सत्ता में मौजूदगी नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के लिए ठोस परिणाम हासिल करना भी होता है।
जब तक बस्ती को गोरखपुर और अयोध्या के बीच एक “बीच का जिला” समझने की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक यह सवाल बार-बार उठता रहेगा कि आखिर इतने नेताओं के होते हुए भी बस्ती विकास की दौड़ में पीछे क्यों छूट गया।
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