पहाड़ों को बचाने से पहले अपने घरों को पत्थर मुक्त करवाए….

Gyan Prakash Dubey


अरावली के बहाने!

आजकल सोशल मीडिया पर पहाड़ बचाओ अरावली बचाओ अभियान जोर शोर से चल रहा है |

प्रकृति ने हमें जो एक वातावरण दिया है उसको बचाना और उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, परंतु क्या सच में हम ऐसा कर रहे हैं या सारा प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर पोस्ट दिखावे और अपने प्रचार प्रसार के लिए ही कर रहे हैं | यह सोचने का विषय है |

अब जरा हम यह भी देखें कि पहले हमारे घर कैसे बनते थे | पहले हमारे घर मिट्टी के घास फूस के बने होते थे | धीरे-धीरे वह पति ईंटों के बननें बाद में छत गिट्टी की लगने लगी और अब तो बगैर मार्बल के लगे कोई घर नहीं तैयार होता |

अब पहाड़ों को बचाने के लिए हमारे क्या करते हुए हैं और हम क्या कर रहे हैं जरा उसको भी देखें..

हमारे यहाँ घर की छत या कॉलम की ढलाई के लिए आम तौर पर दो तरह की गिट्टी आती है—एक झांसी की ओर से और दूसरी झारखंड के पाकुड़ से। पाकुड़ वाली गिट्टी काले पहाड़ से निकाली जाती है, जबकि झांसी की गिट्टी रंग में हल्की होती है और उसे अपेक्षाकृत कम मजबूत माना जाता है। इसी कारण पाकुड़ की गिट्टी लगभग 25 प्रतिशत महंगी होती है।
हालांकि यह भी सच है कि झांसी की गिट्टी बीस–पचास साल में गल नहीं जाती, आखिर वह भी पत्थर ही है। बावजूद इसके, आज स्थिति यह है कि सामान्य ही नहीं, बल्कि गरीब तबके के लोग भी घर बनवाते समय पाकुड़ की गिट्टी ही खरीदना चाहते हैं। कर्ज लेकर, खेत बेचकर—घर बनेगा तो “बेस्ट” मटीरियल से बनेगा। गिट्टी पाकुड़ की होगी और बालू सोनभद्र की।

अब केवल ढलाई ही नहीं, गाँव-देहात के घरों में भी फर्श पर पत्थर लगना जरूरी हो गया है। वह पत्थर अरावली का है या सह्याद्रि का—यह जानने की फुर्सत किसी को नहीं, पर मार्बल होना चाहिए। गोपालगंज जैसे छोटे शहर में भी जब लोग किराए का घर ढूंढते हैं, तो बिना मार्बल फर्श वाले मकानों को पसंद तक नहीं करते।

एक और प्रवृत्ति भी गौर करने लायक है। हमारे देश में कोई व्यक्ति थोड़ा भी सम्पन्न होता है तो वह दूसरा घर बनाता है। गाँव में घर है तो पास के शहर में भी होना चाहिए। वहाँ हो गया तो दिल्ली में फ्लैट, जयपुर में मकान। भले ही उन घरों में साल के बारहों महीने ताले लटके रहें, पर निर्माण रुकेगा नहीं। और इन घरों की नींव से लेकर छत तक—पत्थर ही तो लगता है। न सही अरावली का, झारखंड का ही सही।

सिर्फ घर ही नहीं, सड़कों के लिए भी पत्थर चाहिए। पहले गाँवों में मिट्टी की पगडंडियाँ या ईंट की सड़कें होती थीं, लेकिन अब चार-चार फीट की गलियाँ भी सीमेंट-कंक्रीट की होनी चाहिए। गली में पक्की सड़क न हो, तो हम सरकारों और नेताओं को कोसने लगते हैं।

अब ज़रा सोशल मीडिया पर चल रहे ‘सेव अरावली’ अभियानों पर नजर डालिए। इनमें शामिल अधिकांश लोगों के घरों में फर्श पर मार्बल लगा होगा। और विडंबना यह है कि वह मार्बल उसी अरावली श्रृंखला से निकला हुआ है, जिसे बचाने की बात की जा रही है। मकराना, किशनगढ़, उदयपुर, अंबाजी, बड़ोदरा, कटनी, जबलपुर—देश की अधिकांश संगमरमर खदानें अरावली से ही जुड़ी हैं।
यानि हम ही उस पत्थर के उपभोक्ता हैं और हम ही उसके विनाश पर चिंता जताते हैं। दोनों बातें एक साथ कैसे संभव होंगी?

सच यह है कि जिन वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, बाजार उन्हें किसी भी कीमत पर उपलब्ध कराएगा। सरकारें या अदालतें रोक लगाएँ, तब भी चोरी-छिपे वही वस्तु बाजार में आती रहेगी। जब तक हम अपने घरों के फर्श, दीवारों, रसोई और दुकानों में धड़ल्ले से मार्बल लगाते रहेंगे, तब तक अरावली की छाती पर क्रशर चलते रहेंगे।

अरावली का बचना जरूरी है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उसे मार भी हम ही रहे हैं। अदालतों या सरकारों में बैठे लोग पत्थर नहीं खाते—पत्थर हमारे घरों में लगता है, हमारी सड़कों में बिछता है। अगर सच में अरावली या हिमालय को बचाना है, तो थोड़ा खुद को रोकना होगा।

NGV PRAKASH NEWS

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