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एससी-एसटी एक्ट में सिर्फ अपमानजनक भाषा अपराध नहीं, जाति आधारित अपमान जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026.
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना इस कानून के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ इस एक्ट के तहत मामला तभी बनता है, जब अपमान या धमकी जाति के आधार पर और उसे अपमानित करने के इरादे से दी गई हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने पिछले सप्ताह दिए अपने आदेश में यह टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने का स्पष्ट इरादा साबित न हो, तब तक केवल गाली-गलौज या सामान्य अपमानजनक शब्दों का प्रयोग इस कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
मामला बिहार के केशव महतो उर्फ केशव कुमार महतो से जुड़ा था, जिन्होंने पटना उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। महतो पर आंगनबाड़ी केंद्र में जाति आधारित गाली-गलौज और मारपीट का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी, जिसके आधार पर उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में न तो दर्ज प्राथमिकी में और न ही आरोपपत्र में कहीं भी यह स्पष्ट किया गया था कि आरोपी ने पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित किया। पीठ ने टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने इस पहलू की अनदेखी की और बिना ठोस आधार के एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दे दी।
अदालत ने अधिनियम की धारा 3(1)(आर) का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए दो प्रमुख शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहली, शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य हो और दूसरी, अपमान या धमकी विशेष रूप से इस कारण दी गई हो कि वह उस समुदाय से संबंधित है।
पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता एससी या एसटी वर्ग से आता है। अपराध तभी माना जाएगा, जब यह साबित हो कि अपमान या धमकी जानबूझकर जातिगत आधार पर दी गई थी और उसका उद्देश्य पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करना था।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केशव महतो के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। यह फैसला भविष्य में इस कानून के दुरुपयोग को रोकने और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट दिशा देने वाला माना जा रहा है।
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