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शादीशुदा महिला को शादी का झांसा देकर संबंध बनाने की बात पर भरोसा मुश्किल: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली, 06 फरवरी 2026.
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह मानना आसान नहीं है कि एक शादीशुदा महिला को शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने के लिए बहकाया गया हो।” इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज मुकदमे को रद्द कर दिया।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने साफ कहा कि केवल शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाना, हर मामले में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
अदालत के अनुसार, आईपीसी की धारा 375 के तहत दुष्कर्म तभी बनता है जब यह साबित हो कि आरोपी ने शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए ही झूठा वादा किया गया हो।
अदालत ने इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को भी रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने पहले आरोपी वकील के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी ध्यान दिलाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता महिला खुद एक वकील है, उन की उम्र 33 साल है और वह शादीशुदा है। उन का तलाक का मामला अभी कोर्ट में चल रहा था, यानी वह कानूनी रूप से विवाहित थी। पीठ ने कहा कि ऐसे में यह मानना कठिन है कि महिला अपनी वैवाहिक स्थिति और कानून की स्थिति से अनजान रही होगी।
अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्ष महिला की शादीशुदा स्थिति से परिचित थे, तो आरोपी पर यह आरोप लगाना कि उसने शादी का झांसा देकर उसे बार-बार शारीरिक संबंध बनाने के लिए उकसाया, कानून की नजर में टिकता नहीं है। इसी आधार पर आरोपी वकील के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म का मुकदमा रद्द कर दिया गया।
क्या था पूरा मामला
मामले में शिकायतकर्ता महिला ने पुलिस को बताया था कि सितंबर 2022 में आरोपी वकील के साथ उसके शारीरिक संबंध बने। महिला का दावा था कि यह रिश्ता जनवरी 2025 तक चला। इस दौरान वह गर्भवती हुई और बाद में उसे गर्भपात कराना पड़ा। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि जब परिवार के साथ उसका विवाद हिंसक हो गया, तब उसने फरवरी 2025 में आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया।
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले के तथ्यों और कानून की स्थिति को देखते हुए माना कि इस प्रकरण में दुष्कर्म का मामला नहीं बनता और इसलिए केस को रद्द किया जाता है।
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