अनोखा मामला-पति नहीं, पति का स्पर्म चाहिये…….

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पति की सहमति बिना फ्रीज्ड भ्रूण से मां बनना चाहती महिला, मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा

मुंबई 15 मार्च 26.

मुंबई की एक 46 वर्षीय महिला द्वारा फ्रीज्ड भ्रूण के इस्तेमाल को लेकर दायर याचिका अब दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गई है। महिला अपने अलग रह रहे पति के साथ बनाए गए 16 फ्रीज्ड भ्रूण का इस्तेमाल कर मां बनना चाहती है, लेकिन पति की सहमति न मिलने के कारण यह मामला कानूनी विवाद में बदल गया है। महिला का कहना है कि यह उसके मातृत्व का “आखिरी मौका” है और कानूनी अड़चनें उसके रास्ते में खड़ी हो गई हैं।

जानकारी के अनुसार दक्षिण मुंबई के इस दंपती ने वर्ष 2021 में शादी की थी। वर्ष 2022 में दोनों ने आईवीएफ प्रक्रिया के तहत पति के स्पर्म और पत्नी के अंडाणु से 16 भ्रूण तैयार कर एक फर्टिलिटी क्लिनिक में फ्रीज करवा दिए थे। हालांकि वर्ष 2023 में दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और वे अलग रहने लगे। इसके बाद इन भ्रूणों के इस्तेमाल को लेकर विवाद शुरू हो गया।

महिला ने पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन बाद में उसे वापस लेकर राष्ट्रीय असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) और सरोगेसी बोर्ड के समक्ष गुहार लगाई। बोर्ड ने फरवरी 2026 में उसकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद महिला ने अब दिल्ली हाईकोर्ट में नई याचिका दाखिल कर दी है।

महिला का कहना है कि वह अपने फ्रीज्ड भ्रूण को एक क्लिनिक से दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर कराकर गर्भधारण करना चाहती है। लेकिन असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत भ्रूण के इस्तेमाल या ट्रांसफर के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति जरूरी होती है। महिला का आरोप है कि उसका पति जानबूझकर सहमति नहीं दे रहा और इस तरह वह उसके मातृत्व के अधिकार को रोक रहा है।

याचिका में महिला ने अदालत को बताया कि उसकी उम्र 46 वर्ष हो चुकी है और अब उसके पास मां बनने के लिए बहुत कम समय बचा है। उसने कहा कि यदि जल्द फैसला नहीं हुआ तो वह अपने ही जेनेटिक मटेरियल से मां बनने का मौका हमेशा के लिए खो सकती है। महिला ने यह भी बताया कि गर्भधारण की उम्मीद में उसने फरवरी 2024 में गर्भाशय की बड़ी सर्जरी करवाई थी, जिसका पूरा खर्च उसने स्वयं उठाया।

महिला ने अपने पति पर दुर्व्यवहार और उसे छोड़ देने के आरोप भी लगाए हैं। उसके अनुसार पति दुर्भावना से अपनी सहमति रोक रहा है, जबकि उसके खिलाफ वैवाहिक और आपराधिक मामले पहले से चल रहे हैं। महिला का कहना है कि उसका पति अपनी पिछली शादी से पहले ही एक बच्चे का पिता है, फिर भी वह उसे मां बनने से रोक रहा है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि एआरटी एक्ट के सेक्शन 22 के अनुसार शादी के दौरान बने भ्रूण के इस्तेमाल के लिए दोनों की सहमति जरूरी है, लेकिन कानून में यह स्पष्ट नहीं है कि यदि पति-पत्नी अलग हो चुके हों या वैवाहिक संबंध टूटने की स्थिति में हों तो क्या व्यवस्था होगी। महिला ने इसे कानून का “खालीपन” बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की है।

महिला ने अदालत को यह भी बताया कि उसके सामने मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी एक और कानूनी बाधा है, जिसके अनुसार आईवीएफ जैसी प्रक्रिया केवल वैध विवाह के दौरान ही स्वीकार्य मानी जाती है। ऐसे में यदि वह तलाक ले लेती है तो भी आईवीएफ के माध्यम से मां बनना संभव नहीं रह जाएगा।

महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट से मांग की है कि उसे पति की सहमति के बिना भ्रूण को दूसरे क्लिनिक में ट्रांसफर करने और उन्हें अपने गर्भ में प्रत्यारोपित कराने की अनुमति दी जाए। साथ ही उसने अदालत से एआरटी एक्ट की कुछ धाराओं की व्याख्या स्पष्ट करने या राष्ट्रीय एआरटी बोर्ड को ऐसे मामलों के लिए कानून में संशोधन की सिफारिश करने का निर्देश देने की मांग की है।

महिला ने मामले में जल्द सुनवाई की अपील की है, क्योंकि उसकी उम्र और घटती प्रजनन क्षमता को देखते हुए समय बेहद महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि दिल्ली हाईकोर्ट आने वाले कुछ हफ्तों में इस याचिका पर सुनवाई कर सकता है।

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