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5 साल बाद खुला बेगूसराय वार्डन मौत का राज: जिसे आत्महत्या बताया गया, वह निकली हत्या; बेटियों की जिद से मिला न्याय
बेगूसराय, 31 जुलाई 2026।
बिहार के बेगूसराय जिले में वर्ष 2021 में हुई कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की वार्डन रिंकू कुमारी की संदिग्ध मौत का मामला पांच साल बाद नया मोड़ ले चुका है। जिस घटना को शुरुआती जांच में आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया गया था, अब उसी मामले में एसआईटी जांच के बाद हत्या की पुष्टि होने का दावा किया गया है। इस खुलासे के बाद पुलिस की शुरुआती जांच पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

यह मामला 4 अप्रैल 2021 का है, जब विद्यालय परिसर में वार्डन रिंकू कुमारी का शव फंदे से लटका मिला था। स्थानीय पुलिस ने इसे आत्महत्या मानते हुए जांच पूरी कर दी थी। हालांकि, रिंकू कुमारी की तीनों बेटियां शुरू से ही इसे हत्या बताती रहीं। उनका कहना था कि उनकी मां आत्महत्या कर ही नहीं सकती थीं। पिछले पांच वर्षों तक परिवार ने न्याय के लिए थानों, अधिकारियों और अदालतों के चक्कर लगाए।
आखिरकार मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने शुरुआती जांच में कई गंभीर विसंगतियां पाते हुए अप्रैल 2026 में दोबारा जांच के आदेश दिए। इसके बाद मगध रेंज के आईजी विकास वैभव की निगरानी में एसआईटी का गठन किया गया, जिसने 13 जुलाई 2026 से नए सिरे से जांच शुरू की।
एसआईटी की जांच में सामने आया कि रिंकू कुमारी ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि पहले उनकी गला दबाकर हत्या की गई और बाद में शव को फंदे से लटकाकर आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई। फॉरेंसिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की राय, घटनास्थल की तस्वीरों और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि मृतका का अपने गांव के रहने वाले कौशल कुमार से करीब 15 लाख रुपये का लेन-देन था। पुलिस के अनुसार, कौशल कुमार ने जमीन के नाम पर यह रकम ली थी। जब रिंकू कुमारी पैसे वापस मांगने लगीं तो उसने विद्यालय के केयरटेकर (गार्ड) अजीत कुमार उर्फ बबलू के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची। एसआईटी ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस के मुताबिक, घटना के समय विद्यालय का सीसीटीवी कैमरा बंद था। जांच में कई ऐसे तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मिले हैं, जिनसे आरोपियों की कथित मौजूदगी घटनास्थल के आसपास साबित होने का दावा किया गया है। मामले की जांच अभी भी जारी है।
आईजी विकास वैभव ने इस मामले में तत्कालीन जांच अधिकारी की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शुरुआती जांच के दौरान फॉरेंसिक विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज किया गया और कई महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई। अब इस बात की भी जांच की जा रही है कि इतनी बड़ी लापरवाही क्यों हुई और इसके पीछे कोई अन्य कारण तो नहीं था।
मृतका की बड़ी बेटी तेजस्विनी ने कहा कि जिस दिन उनकी मां की मौत हुई थी, उसी दिन उन्हें शव की स्थिति देखकर यकीन हो गया था कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या है। वहीं दूसरी बेटी चेतना कुमारी ने कहा कि परिवार ने पांच वर्षों तक लगातार न्याय की लड़ाई लड़ी और अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सच सामने आया है। परिवार को उम्मीद है कि दोषियों को कानून के अनुसार कड़ी सजा मिलेगी।
यह मामला सिर्फ एक हत्या की गुत्थी सुलझने की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष का भी प्रतीक है जिसमें बेटियों ने हार नहीं मानी और पांच साल बाद अपनी मां के लिए न्याय की उम्मीद को जिंदा रखा।
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