लव मैरिज का किया विरोध तो बेटे ने कर लिया सुसाइड, अब परिजन मूर्ती बनवाकर 23 साल से कर रहे…….

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लव मैरिज के विरोध की कीमत: बेटे की मौत के बाद 23 साल से मूर्तियों की ‘शादी’ करा रहे माता-पिता

तेलंगाना, 28 मार्च 2026.

एक फैसले ने पूरे परिवार की दुनिया बदल दी। प्रेम विवाह का विरोध, बेटे का टूटना, और फिर एक ऐसा कदम जिसने दो जिंदगियां खत्म कर दीं। लेकिन इस दर्दनाक कहानी का अंत सिर्फ शोक में नहीं हुआ, बल्कि एक ऐसी परंपरा में बदल गया, जिसने पूरे गांव को जोड़ दिया।

साल 2003 में राम कोटी नाम के युवक ने तब आत्महत्या कर ली, जब उसके प्रेम विवाह का परिवार ने विरोध किया। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद उसकी प्रेमिका ने भी अपनी जान दे दी। दो मौतों ने न सिर्फ परिवार बल्कि पूरे गांव को झकझोर दिया। माता-पिता लालू और सुक्कम्मा के लिए यह घटना जिंदगी भर का अपराधबोध बन गई।

बताया जाता है कि बेटे की मौत के बाद एक दिन सुक्कम्मा को सपना आया, जिसमें राम कोटी ने मंदिर बनाने और अपनी शादी कराने की इच्छा जताई। इस सपने ने दुख में डूबे माता-पिता को एक दिशा दी। उन्होंने अपने घर में एक छोटा सा मंदिर बनवाया और राम कोटी व उसकी प्रेमिका की मूर्तियां स्थापित कर दीं।

इसके बाद जो शुरू हुआ, वह सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि भावनाओं का पुनर्जन्म था। हर साल रामनवमी के दिन इन मूर्तियों का विवाह पूरे रीति-रिवाज के साथ कराया जाने लगा। पूजा, भोग, मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधियां—सब कुछ उसी तरह होता है, जैसे किसी जीवित जोड़े की शादी में होता है।

धीरे-धीरे यह आयोजन परिवार की निजी श्रद्धांजलि से निकलकर पूरे गांव की आस्था का हिस्सा बन गया। अब इस अनुष्ठान में गांव के लोग, रिश्तेदार और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु भी शामिल होते हैं। मंदिर में स्थापित मूर्तियों को दिव्य रूप मानकर पूजा की जाती है और इस विवाह को भगवान राम और सीता के पवित्र मिलन की तरह देखा जाता है।

23 साल से लगातार निभाई जा रही यह परंपरा इस बात का उदाहरण बन गई है कि कैसे गहरा दुख भी समय के साथ श्रद्धा और विश्वास में बदल सकता है। जहां एक तरफ यह माता-पिता के दिल में बसे अपराधबोध को कम करने का जरिया है, वहीं दूसरी तरफ यह पूरे समाज को यह संदेश भी देती है कि भावनाओं को समझना कितना जरूरी है।

आज यह अनोखी परंपरा तेलंगाना में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग इसे प्रेम, पछतावे और आस्था के संगम के रूप में देखते हैं। हर साल रामनवमी पर जब यह ‘शादी’ होती है, तो सिर्फ एक रस्म नहीं निभाई जाती, बल्कि दो अधूरी कहानियों को एक प्रतीकात्मक मुकाम दिया जाता है।

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