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एफआईआर बनाम परिवाद: डीजीपी के सख्त निर्देश के बाद यूपी पुलिस में बदलेगा काम करने का तरीका
लखनऊ, 28 मार्च 26.
उत्तर प्रदेश पुलिस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सुधार की दिशा में कदम उठाते हुए डीजीपी राजीव कृष्ण ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जिन मामलों में कानून के तहत केवल परिवाद (शिकायत) का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह अवैध और अनुचित माना जाएगा। यह निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा इस विषय पर कड़ी आपत्ति जताए जाने के बाद जारी किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है।
दरअसल, लंबे समय से यह देखा जा रहा था कि कई मामलों में पुलिस बिना कानूनी प्रावधान की जांच किए सीधे एफआईआर दर्ज कर लेती है। पहली नजर में यह कार्रवाई कठोर और सक्रिय पुलिसिंग का उदाहरण लग सकती है, लेकिन कानूनी दृष्टिकोण से यह बड़ी गलती साबित होती है। ऐसे मामलों में आरोपी को अदालत से राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि गलत प्रक्रिया अपनाने से पूरी जांच कमजोर हो जाती है।
डीजीपी ने अपने निर्देश में यह भी रेखांकित किया है कि एफआईआर दर्ज करने से पहले यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि संबंधित अपराध संज्ञेय (Cognizable) श्रेणी में आता है या नहीं। यदि मामला असंज्ञेय (Non-cognizable) या ऐसा है जिसमें केवल परिवाद के माध्यम से ही कार्यवाही संभव है, तो सीधे एफआईआर दर्ज करना कानून का उल्लंघन माना जाएगा।
विशेष रूप से उन्होंने जिन कानूनों का उल्लेख किया है, उनमें मानहानि, घरेलू हिंसा के कुछ प्रावधान, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट (विशेषकर चेक बाउंस के मामले), माइंस एंड मिनरल एक्ट, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट और पशुओं के प्रति क्रूरता से जुड़े मामलों का नाम शामिल है। इन मामलों में पीड़ित को सीधे अदालत में परिवाद दाखिल करना होता है, न कि थाने में एफआईआर दर्ज कराना।
इसके अलावा, दहेज से जुड़े कई मामलों सहित लगभग 30 ऐसे कानूनों का उल्लेख किया गया है, जिनमें न्यायिक प्रक्रिया की शुरुआत परिवाद के जरिए ही होती है। इसका मतलब यह है कि पुलिस की भूमिका सीधे एफआईआर दर्ज करने की नहीं, बल्कि न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सीमित कार्रवाई करने की होती है।
यह निर्देश पुलिस अधिकारियों के लिए एक तरह से चेतावनी भी है। डीजीपी ने साफ कर दिया है कि यदि कोई भी अधिकारी या थाना प्रभारी इन दिशा-निर्देशों की अनदेखी करता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई तय मानी जाएगी। इससे यह संकेत मिलता है कि अब पुलिसिंग में केवल सक्रियता ही नहीं, बल्कि कानूनी सटीकता भी उतनी ही जरूरी होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से दो बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पहला, अदालतों में अनावश्यक मुकदमों का बोझ कम होगा और दूसरा, जांच प्रक्रिया अधिक मजबूत और कानूनी रूप से टिकाऊ बनेगी। साथ ही इससे आम नागरिकों को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि हर विवाद या शिकायत एफआईआर के दायरे में नहीं आती।
कुल मिलाकर, यह निर्देश उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज में एक महत्वपूर्ण सुधार की शुरुआत माना जा रहा है, जो कानून के सही अनुपालन और न्यायिक प्रक्रिया की मजबूती की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है।
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