Gyan Prakash Dubey NGV PRAKASH NEWS

चकबंदी में मिलीभगत का आरोप: 50 साल से काबिज दलित परिवार को करने की कोशिश, वृक्षारोपण के नाम पर जमीन आवंटन विवाद
बस्ती, 02 मई 2026 — जनपद के कलवारी थाना क्षेत्र में चकबंदी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं, जहां एक दलित परिवार ने वर्षों से काबिज जमीन से बेदखल किए जाने की आशंका जताई है। मामला कलवारी गांव का है, जहां जुग्गीलाल पुत्र विश्राम ने प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है।
पीड़ित के अनुसार, वह गाटा संख्या 33, चक संख्या 484 की भूमि पर पिछले करीब 50 वर्षों से काबिज हैं और बीते 30 वर्षों से उसी जमीन पर मकान बनाकर परिवार सहित निवास कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसी जमीन पर खेती कर उनका परिवार जीवन यापन करता है और यही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।
जुग्गीलाल का आरोप है कि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान बैजलपुर निवासी रघुवर चौरसिया पुत्र जीतू ने संबंधित लेखपाल और चकबंदी अधिकारियों से मिलीभगत कर दबाव बनाया और उनकी जमीन पर “उड़ान चक” बैठा लिया। आरोप यह भी है कि इस पूरे प्रकरण में प्रभाव और धनबल का इस्तेमाल किया गया, जिसके चलते जमीन के आवंटन में बदलाव किया गया।
पीड़ित का कहना है कि जब इस मामले की जानकारी हुई तो उन्होंने अन्य कब्जेदारों के साथ चकबंदी अधिकारी के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई। इस पर चकबंदी अधिकारी सोनूपार द्वारा रामलाल व जुग्गीलाल पुत्र विश्राम के पक्ष में निर्णय दिया गया था। इसके बावजूद विपक्षी पक्ष शांत नहीं हुआ और पुनः दबाव बनाते हुए लेखपाल एवं चकबंदी अधिकारियों को प्रभावित कर उक्त जमीन को वृक्षारोपण के लिए आवंटित करवा दिया गया, जिससे अब कब्जेदारों को बेदखल करने की स्थिति बन रही है।
मामले का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी सामने आया है कि विश्राम पुत्र जीतू दलित समुदाय से थे और उनके पास निजी भूमि न होने के कारण सरकार द्वारा यह जमीन 99 वर्षों के लिए पट्टे पर दी गई थी। ऐसे में पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें उनके अधिकार से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है।
पीड़ित ने प्रशासन से मांग की है कि उनकी वर्षों पुरानी कब्जेदारी, निवास और पट्टे के आधार को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष जांच कराई जाए और किसी भी प्रकार की बेदखली की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए। इस मामले ने चकबंदी प्रक्रिया की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर भी इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
यह देखना अहम होगा कि प्रशासन एक दलित परिवार जिसकी आजीविका का एकमात्र सहारा वहीं जमीन है जहां पर वह स्थाई रूप से पिछले 30 वर्षों से निवास कर रहा है इस संवेदनशील मामले में क्या कदम उठाता है और पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं।
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