अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिलाओं को पुलिस जबरन हिरासत में नहीं ले सकती, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला…….

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अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिलाओं को जबरन नहीं रखा जा सकता, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली, 31 मई 2026.

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करने वाली वयस्क महिलाओं को उनकी इच्छा के खिलाफ न तो “बचाया” जा सकता है और न ही किसी संरक्षण गृह या हिरासत में रखा जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी वयस्क महिला की स्वतंत्रता और उसकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने यह फैसला मानव तस्करी और कमर्शियल सेक्स से जुड़े मामलों में पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने कहा कि सभी मामलों को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि कुछ महिलाएं मानव तस्करी या दबाव का शिकार होती हैं, जबकि कुछ वयस्क महिलाएं अपनी इच्छा से इस पेशे में काम करती हैं।

अदालत ने कहा कि किसी महिला को संरक्षण गृह में रखने या पुनर्वास से जुड़ा फैसला लेने से पहले उसकी इच्छा जानना जरूरी है। यदि कोई वयस्क महिला अपनी मर्जी से सेक्स वर्क कर रही है और वह संरक्षण गृह में नहीं रहना चाहती, तो उसकी इच्छा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल विशेष परिस्थितियों में ही उसकी राय को नजरअंदाज किया जा सकता है, जैसे उसकी सुरक्षा को गंभीर खतरा हो या उसकी सहमति दबाव, धमकी या किसी अनुचित प्रभाव के तहत दी गई हो।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और भविष्य से जुड़े फैसले उसकी राय के बिना नहीं लिए जा सकते। अदालत ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में सबसे पहले यह जांच की जाए कि संबंधित महिला अपनी इच्छा से इस काम में है या नहीं और क्या वह संरक्षण गृह में रहना चाहती है।

कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि अपनी मर्जी से सेक्स वर्क करना अपने आप में अवैध नहीं है। इसलिए पुलिस और प्रशासन को ऐसी महिलाओं के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए और न ही उन्हें अनावश्यक रूप से हिरासत में लेना चाहिए।

फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनर्वास का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे किसी पर जबरन नहीं थोपा जा सकता। सरकार का दायित्व है कि वह जरूरतमंद लोगों को सहायता और विकल्प उपलब्ध कराए, लेकिन अंतिम निर्णय संबंधित व्यक्ति की इच्छा के अनुसार होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मानवाधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिलाओं की स्वायत्तता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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