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भदोही जिला अस्पताल में प्रसूता का गेट के बाहर प्रसव, जाति के नाम पर भर्ती न करने का आरोप; जांच के बाद पांच स्वास्थ्यकर्मियों पर कार्रवाई
भदोही, 2 अक्टूबर 2026.
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में गर्भवती महिला के अस्पताल के गेट के बाहर सड़क किनारे प्रसव होने का मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। घटना को लेकर महिला के परिजनों ने अस्पताल के कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं स्वास्थ्य विभाग ने महिला की हालत गंभीर होने और हीमोग्लोबिन का स्तर महज 5 ग्राम होने के कारण उसे उच्चस्तरीय उपचार के लिए रेफर किए जाने की बात कही है। जांच के बाद विभाग ने कई अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।
सबसे पहले एक जरूरी तथ्य-सुधार: यह घटना महाराजा बलवंत सिंह सरकारी अस्पताल, भदोही की नहीं, बल्कि ज्ञानपुर स्थित महाराजा चेत सिंह जिला चिकित्सालय की बताई गई है। भदोही जिला प्रशासन की वेबसाइट पर दोनों अस्पताल अलग-अलग दर्ज हैं।
📍20 वर्षीय रानी देवी को प्रसव पीड़ा के बाद अस्पताल लाया गया
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जोरई गांव निवासी 20 वर्षीय रानी देवी, पत्नी सुनील, को प्रसव पीड़ा होने पर 29 सितंबर की रात परिजन ज्ञानपुर स्थित महाराजा चेत सिंह जिला चिकित्सालय लेकर पहुंचे थे। महिला के अस्पताल पहुंचने के बाद उसके उपचार और भर्ती को लेकर विवाद की स्थिति बनी। कुछ रिपोर्टों के अनुसार परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में मौजूद स्टाफ ने महिला को भर्ती नहीं किया और उसे वापस जाने को कहा।
परिजनों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि महिला के वनवासी/मुसहर समुदाय से होने की बात कहते हुए उसके साथ भेदभाव किया गया। कुछ रिपोर्टों में स्टाफ नर्स पर कथित तौर पर जाति का हवाला देकर प्रसव कराने से इनकार करने का आरोप लगाया गया है। हालांकि, महिला के शरीर से बदबू आने की बात कहकर बाहर निकाले जाने का दावा मुझे उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं मिला, इसलिए इसे तथ्य के रूप में लिखना उचित नहीं होगा।
📍अस्पताल के गेट के बाहर सड़क पर हुआ प्रसव
अस्पताल से महिला को लेकर परिजन बाहर निकल रहे थे। इसी दौरान अस्पताल के गेट के पास उसकी प्रसव पीड़ा बढ़ गई। परिजनों और आसपास मौजूद महिलाओं ने चादर की आड़ बनाकर सड़क किनारे ही प्रसव कराया। इस दौरान महिला ने बच्चे को जन्म दिया। घटना के बाद अस्पताल के बाहर लोगों में नाराजगी फैल गई और हंगामे की स्थिति पैदा हो गई।
घटना की जानकारी मिलने के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एसके चक मौके पर पहुंचे। बाद में महिला और नवजात को जिला अस्पताल लाकर भर्ती कराया गया। रिपोर्टों के अनुसार महिला को उपचार दिया गया और रक्त चढ़ाया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जच्चा और बच्चा दोनों चिकित्सकों की निगरानी में स्वस्थ बताए गए।
📍CMO का पक्ष: हीमोग्लोबिन केवल 5 ग्राम था
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष इस मामले में अलग है। सीएमओ डॉ. एसके चक के अनुसार महिला की जांच में उसका हीमोग्लोबिन लगभग 5 ग्राम पाया गया था। इतनी कम हीमोग्लोबिन की स्थिति को गंभीर मानते हुए उसे उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधा के लिए पहले मिर्जापुर मंडलीय अस्पताल और बाद में बीएचयू रेफर किए जाने की बात सामने आई है।
रिपोर्टों के अनुसार महिला पहले मिर्जापुर गई थी, लेकिन वहां से उसे बीएचयू ले जाने की सलाह दी गई। इसके बाद वह दोबारा ज्ञानपुर जिला अस्पताल पहुंची। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार डॉक्टर और स्टाफ नर्स ने उसकी स्थिति देखी और कम हीमोग्लोबिन को देखते हुए बीएचयू रेफर किया। विभाग का यह भी कहना था कि परिवार 102 एंबुलेंस सेवा से संपर्क नहीं कर सका और अस्पताल से लौटते समय महिला का प्रसव अस्पताल के बाहर हो गया।
📍जांच में सामने आई स्वास्थ्यकर्मियों की लापरवाही
मामला सामने आने के बाद सीएमओ ने चार सदस्यीय जांच टीम गठित की। टीम ने अस्पताल के डॉक्टरों, स्टाफ नर्स और अन्य कर्मचारियों के बयान लिए तथा घटनाक्रम की जांच की। बाद में जांच रिपोर्ट जिलाधिकारी शैलेष कुमार को सौंपी गई।
जांच में इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात डॉ. पंकज कुमार पर महिला की समुचित प्राथमिक जांच और उपचार न करने की लापरवाही सामने आने की बात कही गई। इसके बाद उनकी सेवा समाप्त करने की कार्रवाई शुरू की गई।
स्टाफ नर्स नीलम मौर्या के खिलाफ भी कार्रवाई की गई। अलग-अलग रिपोर्टों में उनके निलंबन अथवा स्थानांतरण की जानकारी दी गई है; नवीन रिपोर्टों में उन्हें मरीज की जांच और एंबुलेंस तक पहुंचाने की प्रक्रिया में लापरवाही के लिए निलंबित किए जाने की बात कही गई है।
इसके अलावा स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मुकेश प्रजापति का सितंबर 2026 का वेतन अग्रिम आदेश तक रोकने की कार्रवाई की गई। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एके तिवारी के खिलाफ प्रशासनिक लापरवाही को लेकर विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई है। डॉ. नीलिमा धवन के खिलाफ भी ड्यूटी में कथित लापरवाही को लेकर शासन को कार्रवाई की संस्तुति भेजी गई।
📍जातीय भेदभाव के आरोप की जांच भी महत्वपूर्ण
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू महिला के परिजनों द्वारा लगाया गया जातीय भेदभाव का आरोप है। परिजनों का कहना है कि महिला को मुसहर/वनवासी समुदाय का होने के कारण भर्ती नहीं किया गया। दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग ने महिला के अत्यंत कम हीमोग्लोबिन और उच्चस्तरीय उपचार की आवश्यकता को रेफर किए जाने का कारण बताया है।
जांच के बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि प्रशासन ने मामले में केवल रेफर किए जाने की प्रक्रिया को ही नहीं देखा, बल्कि महिला की प्राथमिक जांच, उपचार, एंबुलेंस व्यवस्था और अस्पताल प्रशासन की भूमिका को भी जांच के दायरे में रखा। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में जातीय भेदभाव के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और किसी कर्मचारी द्वारा वास्तव में ऐसा कथन किए जाने का निर्णायक प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
📍अस्पताल की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला का अस्पताल परिसर के बाहर सड़क पर बच्चे को जन्म देना अपने आप में स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासतौर पर तब, जब महिला पहले से गंभीर एनीमिया की स्थिति में बताई जा रही थी।
जांच में सामने आई कार्रवाई यह भी बताती है कि मामला केवल परिवार और अस्पताल के बीच विवाद तक सीमित नहीं रहा। स्वास्थ्य विभाग ने ड्यूटी पर मौजूद कर्मचारियों की भूमिका, प्राथमिक चिकित्सा, रेफरल और एंबुलेंस व्यवस्था की प्रक्रिया की समीक्षा की है। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी मामले का संज्ञान लिया और जांच के बाद कार्रवाई की गई।
फिलहाल इस घटना ने एक साथ दो महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं—गंभीर एनीमिया से जूझ रही प्रसूता को रेफर करते समय क्या उसे सुरक्षित तरीके से उच्चस्तरीय अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी और क्या उसके साथ जाति के आधार पर कोई भेदभाव हुआ था? उपलब्ध जांच और कार्रवाई से पहले सवाल पर विभागीय लापरवाही के संकेत सामने आए हैं, जबकि दूसरे आरोप की स्थिति जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।
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