पुराने मित्रों में परीक्षा की घड़ी- रूस ने क्यों नहीं खुलकर किया भारत का समर्थन

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रूस और भारत: पुराने मित्रों की नई परीक्षा

14 मई 2025, नई दिल्ली | NGV PRAKASH NEWS

1955 में जब सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव भारत आए थे और कहा था, “हम आपके बहुत क़रीब हैं, पर्वत की चोटी से भी पुकारोगे तो आएंगे”, तब से लेकर अब तक रूस और भारत की दोस्ती समय की तमाम चुनौतियों से गुज़र चुकी है। लेकिन 2025 की बदलती वैश्विक व्यवस्था में यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है—क्या रूस आज भी उतना ही भरोसेमंद है जितना कभी सोवियत संघ हुआ करता था?

इतिहास की नींव: कश्मीर, गोवा और वीटो पॉलिटिक्स

भारत के लिए रूस (पूर्व में सोवियत संघ) एक ऐसा मित्र रहा है जिसने न सिर्फ़ कठिन समय में साथ दिया बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत की संप्रभुता की रक्षा की। कश्मीर के मुद्दे पर जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाए गए, तो 1957, 1962 और 1971 में सोवियत संघ ने उन्हें वीटो कर रोक दिया। कुल छह बार रूस ने भारत के पक्ष में वीटो का प्रयोग किया, जिनमें से अधिकतर कश्मीर से जुड़े प्रस्ताव थे। यही नहीं, गोवा में पुर्तगाली शासन के ख़िलाफ़ भारतीय सैन्य कार्रवाई के समय भी रूस ने भारत का समर्थन किया।

2019 से 2025: बदलती ज़मीन, बदलते रुख़

जब अगस्त 2019 में भारत ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया, तब रूस ने स्पष्ट रूप से भारत का समर्थन किया था। लेकिन 2025 में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान में की गई जवाबी सैन्य कार्रवाई पर रूस की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत ठंडी और संतुलित रही।

रूस ने कहा, “भारत हमारा रणनीतिक साझेदार है, पाकिस्तान भी पार्टनर है। हम दोनों से अच्छे संबंध चाहते हैं।” इसके साथ ही रूस ने भारत-पाकिस्तान से तनाव कम करने और मध्यस्थता की पेशकश की। यह भारत के लिए एक अप्रत्याशित संकेत था, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से रूस ने भारत की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए कभी ऐसे हस्तक्षेप की पेशकश नहीं की थी।

विश्लेषण और प्रतिक्रियाएँ: विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की तन्वी मदान कहती हैं, “रूस जो खुद यूक्रेन पर दो बार हमला कर चुका है, वो भारत से कह रहा है कि पाकिस्तान से वार्ता करो? यह विरोधाभास है।”

उनके इस तंज पर ORF के रूस मामलों के विशेषज्ञ एलेक्सेई ज़ाखरोव ने लिखा, “90 के दशक से रूस का रुख़ मिश्रित रहा है। 2002 में पुतिन ने भारत-पाक विवाद में मध्यस्थता की कोशिश की थी। अब वैश्विक ताकतों को सामूहिक रूप से तनाव कम करने में भूमिका निभानी होगी।”

एचएसई यूनिवर्सिटी, मॉस्को की प्रोफेसर निवेदिता कपूर कहती हैं, “जब चीन पाकिस्तान का खुला समर्थन करता है, तो भारत उम्मीद करता है कि रूस भी उसका पुराना मित्र बनकर खड़ा हो। लेकिन रूस अपनी संतुलनकारी भूमिका को प्राथमिकता देता है।”

रूस की द्विध्रुवीयता: कारण क्या हैं?

जेएनयू के प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं, “इस बार रूस का रुख़ स्पष्ट रूप से संतुलित रहा है। भारत के पक्ष में वह पुराना एकतरफ़ा समर्थन नज़र नहीं आया।”

इसके पीछे तीन मुख्य कारण बताए जाते हैं:

  1. यूक्रेन युद्ध में भारत की तटस्थता: भारत ने रूस का खुला समर्थन नहीं किया, बल्कि शांति और बातचीत की वकालत की।
  2. भारत-अमेरिका नज़दीकियाँ: रक्षा साझेदारी और तकनीकी सहयोग अमेरिका के साथ बढ़ा है, जबकि रूस की भूमिका कम हुई है।
  3. रूस-पाकिस्तान समीकरण: रूस अब पाकिस्तान के साथ व्यापार बढ़ा रहा है और अफगानिस्तान में तालिबान के साथ मिलकर रणनीतिक बढ़त चाहता है।

व्यापार और रक्षा सहयोग में गिरावट

जहां 2009-13 में भारत के 76% हथियार रूस से आते थे, वहीं 2019-23 के बीच यह आंकड़ा गिरकर 40% से नीचे आ गया है। भारत अब अमेरिका, फ्रांस और इज़राइल की ओर भी देख रहा है। हालांकि भारत ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम भी ख़रीदा, जो इस बार पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकने में महत्वपूर्ण रहा।

तेल व्यापार में अब भी रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर है—2024 में 60 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत ने रूस से खरीदा। लेकिन रणनीतिक और सामरिक स्तर पर यह साझेदारी अब पहले जैसी एकतरफ़ा नहीं रही।

भविष्य की दिशा: मित्रता या विवेकशील दूरी?

राष्ट्रपति पुतिन 2021 के बाद से भारत नहीं आए हैं। उन्होंने चीन की दो यात्राएँ की हैं, और भारत में 2023 के G20 समिट में भी अनुपस्थित रहे। यह स्पष्ट संकेत हैं कि रूस अब अपनी प्राथमिकताओं को नए तरीके से व्यवस्थित कर रहा है।

फिर भी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि रूस-भारत संबंधों में दरार आ गई है। यह एक पुनर्संयोजन की प्रक्रिया है—जिसमें मित्रता की परिभाषा अब साझेदारी और हितों की नई गणना पर आधारित होगी।


निष्कर्ष:
भारत और रूस के रिश्ते अब “पर्वत की चोटी से पुकारने पर आने वाले” जज़्बात से ज़्यादा एक विवेकशील कूटनीति में ढल चुके हैं। भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखा है और रूस भी अपनी बदलती ज़रूरतों के अनुसार संतुलन साध रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद, अगर कूटनीति के मैदान में कोई पुराना और अनुभवी साझेदार है जिस पर भारत अब भी आंशिक भरोसा करता है—तो वह रूस ही है।

– NGV PRAKASH NEWS


👉 लेख बीबीसी तथा अन्य सोशल मीडिया पर आधारित खबरों के आधार पर..

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