क्या डीआईजी के हस्तक्षेप के बिना नहीं जागती पुलिस की संवेदनशीलता? मासूम की हत्या के बाद उठा सवाल

क्या डीआईजी के हस्तक्षेप के बिना नहीं जागती पुलिस की संवेदनशीलता? मासूम की हत्या के बाद उठा सवाल

बस्ती, 17 जून 2025 | रिपोर्ट: G. P. Dubey
जनपद बस्ती के पैकोलिया थाना क्षेत्र में हुई मासूम परी की नृशंस हत्या ने न सिर्फ इंसानियत को झकझोर दिया, बल्कि पुलिसिया संवेदनहीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस प्रकार इस जघन्य वारदात के बाद डीआईजी संजीव त्यागी के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस अधीक्षक अभिनंदन हरकत में आए, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिले की पुलिस व्यवस्था सिर्फ उच्चाधिकारियों के निर्देश पर ही कार्रवाई करने के लिए मजबूर है?

डीआईजी की फटकार के बाद जागी पुलिस

घटना के दो दिन बाद जब बस्ती रेंज के डीआईजी संजीव त्यागी खुद घटना में घायल लोगों का कुशाल क्षेम पूछने अस्पताल पर पहुंचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात कर पूरी जानकारी ली, तभी जाकर पुलिस अधीक्षक अभिनंदन द्वारा थाना प्रभारी धर्मेंद्र यादव, उपनिरीक्षक रमेश कुमार तथा कांस्टेबल देवनाथ यादव को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। सवाल यह है कि यदि डीआईजी पीड़ित परिजनों से मिलने के लिए जिला अस्पताल नहीं आते, तो क्या मासूम परी की मौत भी ‘फाइलों में दब’ जाती?

यह पहली बार नहीं…

यह पहला मौका नहीं है जब किसी थाना प्रभारी पर कार्रवाई डीआईजी के निर्देश के बाद हुई हो। पूर्व पुलिस अधीक्षक गोपाल कृष्ण चौधरी के कार्यकाल में भी डीआईजी दिनेश कुमार पी के हस्तक्षेप पर कप्तानगंज थाना प्रभारी अनिल कुमार दुबे को निलंबित किया गया था। हालांकि बाद में क्षेत्राधिकारी की जांच रिपोर्ट के आधार पर उन्हें बहाल कर दिया गया था।

क्या एसपी को नहीं रहती जानकारी?

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या जिले के पुलिस अधीक्षक को अपने अधीनस्थों की कार्यशैली और क्षेत्र की स्थिति की जानकारी नहीं रहती? क्या उच्चाधिकारी की मौजूदगी और फटकार के बिना, मातहतों की जवाबदेही तय करना संभव नहीं है?

पैकोलिया थाने के जीतीपुर गांव में जमीन विवाद को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें की गई थीं, लेकिन लगातार अनदेखी होती रही। क्या प्रशासन ऐसी ही किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा था, जिसमें मासूम की बलि चढ़े और तब जाकर कार्रवाई हो?

पूर्व की लापरवाही की पुनरावृत्ति

ऐसा ही एक उदाहरण कप्तानगंज थाने में देखने को मिला था, जब प्रभारी निरीक्षक अनिल कुमार दुबे ने एक बड़ी घटना के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई थी, जबकि पीड़ित परिवार तीन घंटे तक थाने पर धरने पर बैठे थे। ऐसे में यह मान लेना मुश्किल है कि संबंधित अधिकारी को घटनाक्रम की कोई जानकारी नहीं रही होगी।

प्रशासन को आत्ममंथन की आवश्यकता

जमीनी विवाद, प्रशासनिक लापरवाही और पुलिस की निष्क्रियता मिलकर एक बार फिर बस्ती को शर्मसार कर गए। मासूम परी की मौत न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि यह व्यवस्था की गूंगी-बहरी चुप्पी का जीता-जागता प्रमाण भी है। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो अगला शिकार कौन होगा — यह कहना कठिन नहीं।

NGV PRAKASH NEWS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *