जहाँ 5000 जनता को चारों तरफ से घेर कर कत्ल कर दिया गया

महुआ डाबर : 1857 की वह बर्बर कहानी जिसे इतिहास ने भुला दिया
— NGV PRAKASH NEWS विशेष रिपोर्ट

बस्ती, 3 जुलाई 2025।
1857 की क्रांति का जिक्र आते ही मेरठ, झांसी, कानपुर और दिल्ली की घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन देश की आज़ादी की यह लड़ाई कई ऐसे खामोश गांवों की कुर्बानियों से भी सनी हुई है जिनकी आवाज़ कभी इतिहास के पन्नों में दर्ज ही नहीं हो सकी। उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद का एक ऐसा ही वीरगाथा समेटे गांव था— महुआ डाबर, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने 3 जुलाई 1857 को पूरी बेरहमी से मिट्टी में मिला दिया

🔥 गांव को ‘ग़ैर चिरागी’ घोषित कर जला दिया गया

बस्ती जनपद के बहादुरपुर ब्लॉक में स्थित महुआ डाबर गांव में 1857 की क्रांति में स्थानीय क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेज अधिकारियों की एक टुकड़ी को मौत के घाट उतार दिया गया था। इसके जवाब में अंग्रेजों ने इस गांव को तीन तरफ से घेर कर हमला कियाकरीब 5,000 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर दी गई। बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों को बेरहमी से मारा गया, गांव को जला कर खाक कर दिया गया और आधिकारिक रूप से ‘ग़ैर चिरागी’ (जहां अब कोई रोशनी नहीं होगी) घोषित कर दिया गया।

📜 गांव की पहचान मिटाने की साजिश

इतना ही नहीं, अंग्रेजों ने गांव के अस्तित्व को इतिहास से ही मिटा देने की योजना बनाई। लगभग 50 किलोमीटर दूर, गौर के पास एक नया गांव बसाया गया और उसका नाम भी ‘महुआ डाबर’ रखा गया ताकि असली गांव की पहचान हमेशा के लिए गुम हो जाए। 1907 के बस्ती गजेटियर में भी नए गांव को ही असली महुआ डाबर बताया गया, जबकि असली गांव पर ‘ग़ैर चिरागी’ का प्रतिबंध था।

⚔️ क्रांतिकारियों ने दी थी चुनौती

इस जनयुद्ध का नेतृत्व गुलाब खां, वज़ीर खां, अमीर खां, पिरई खां, जफर अली जैसे स्थानीय वीरों ने किया था। मनोरमा नदी के किनारे हुए संघर्ष में कई अंग्रेज अफसर मारे गए, जिसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने बस्ती के बर्डपुर जमींदार विलियम पेप्पे को इस विद्रोह को कुचलने का आदेश दिया। 3 जुलाई 1857 को उसकी अगुवाई में गांव का नरसंहार किया गया।

📚 इतिहास की खामोशी और पुनरुद्धार का प्रयास

आज़ादी के बाद भी महुआ डाबर को वह सम्मान नहीं मिला जो जालियांवाला बाग जैसी घटनाओं को मिला। न कोई राष्ट्रीय स्मारक बना, न कोई ब्रिटिश अफसोस।
हालांकि 1999 में डॉ. शाह आलम राना के प्रयासों से ‘महुआ डाबर संग्रहालय’ की स्थापना हुई। 2010 में खुदाई में गांव के अस्तित्व के प्रमाण— ईंट की दीवारें, औज़ार, सिक्के, राख, जलती लकड़ियों के टुकड़े आदि— ज़मीन से बाहर आए

🇮🇳 अब उम्मीद की लौ

2022 की उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति में इसे ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में शामिल किया गया और 2025 से हर 10 जून को शस्त्र सलामी शुरू हुई। फिर भी सवाल बना है कि जब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ और प्रधानमंत्री डेविड कैमरून जालियांवाला बाग पर खेद जता सकते हैं, तो महुआ डाबर की नरसंहार जैसी त्रासदी पर अब तक चुप्पी क्यों?


महुआ डाबर केवल गांव नहीं, एक चेतावनी है कि कैसे सत्ता के सामने निर्दोषों की कुर्बानियों को मिटाने की कोशिश की गई, लेकिन मिटाया नहीं जा सका। अब समय है कि महुआ डाबर को भी राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी इस दर्दनाक सच्चाई से परिचित हो सके।

🕯 आज जब हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, महुआ डाबर की राख से उठती चीखें अब भी न्याय की मांग कर रही हैं।

📌 यह विशेष रिपोर्ट ‘NGV PRAKASH NEWS’

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