


गाजीपुर | 07 जुलाई 2025 | विशेष रिपोर्ट – NGV PRAKASH NEWS
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक गांव है, जिसका नाम सुनते ही आसपास के लोग खामोश हो जाते हैं – बसुका। यह गांव न तो किसी ऐतिहासिक युद्ध के लिए जाना जाता है, न किसी संत की तपोभूमि के लिए, बल्कि यहां की बदनाम गलियों और एक विलुप्त होती ‘कला’ के नाम पर इसे पहचाना जाता है – मुजरा।
लेकिन यह कहानी सिर्फ कला की नहीं है, यह उन औरतों की भी है जो पीढ़ियों से समाज के हाशिए पर जी रही हैं, जिनका नाम भी उनकी पहचान नहीं होता।
बिना पुरुषों के बच्चे? सोशल मीडिया की सनसनी, लेकिन सच्चाई कुछ और है
सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपको ढेरों वीडियो मिल जाएंगे, जिनमें दावा किया जाता है कि बसुका गांव की महिलाएं बिना मर्दों के बच्चों को जन्म देती हैं। यह दावा जितना चौंकाने वाला है, उतना ही भ्रामक भी। दरअसल, गांव के बाहरी हिस्से में वर्षों से एक बस्ती आबाद है, जो ‘तवायफों’ की मानी जाती है। यहां आज भी मुजरा होता है, ऑर्केस्ट्रा चलता है और…कभी-कभी मजबूरी वेश्यावृत्ति में भी बदल जाती है।
300 साल पुरानी कला या सामाजिक अभिशाप?
आजादी से पहले बसुका में मुजरे की महफिलें सजती थीं। तब यह कला थी, इज्जत थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, मंच छिन गया और ये महिलाएं कोठों में कैद हो गईं। कहते हैं, कला जब पेट भरने लायक न रहे तो वह मजबूरी बन जाती है।
आज गांव में 15-20 परिवार ही बचे हैं जो इस परंपरा से जुड़े हैं। बाकियों के लिए यह जीवन अब बोझ बन चुका है।
‘13 की उम्र में जबरन इस दलदल में उतारा गया’: तबस्सुम की कहानी
तबस्सुम (बदला हुआ नाम) की आंखों में आज रोशनी है, लेकिन बीते कल में अंधेरा ही अंधेरा था। वह बताती हैं, ‘13 साल की उम्र में मुझे इस धंधे में उतार दिया गया। दवाएं देकर जवान बनाया गया। मेरी भी एक नाजायज औलाद है। जब स्कूल में उसका नाम लिखवाने गई, तो पिता के नाम पर भाई का नाम लिखवाना पड़ा। मैं टूट गई। लेकिन अब मैंने सब कुछ छोड़ दिया है। मेरे पति मुंबई में ऑटो चलाते हैं, उन्होंने मेरी मजबूरी को समझा और साथ दिया। आज मैं 29 लाख का फ्लैट बनारस में ले चुकी हूं।’
तबस्सुम चाहती हैं कि उनकी जैसी कोई और लड़की इस अंधे कुएं में न गिरे।
तवायफ और वेश्या में फर्क है, सुनिए गुड़िया की जुबानी
गांव की एक और महिला, गुड़िया कहती हैं, ‘हम वेश्या नहीं हैं। हम तो ठुमरी, सोहर और लोकगीतों से मनोरंजन करते हैं। तवायफ और वेश्या में अंतर होता है। तवायफ किसी का घर नहीं तोड़ती, बल्कि सम्मान देती है।’
गुड़िया का आरोप है कि गांव के सरपंच और कुछ लोगों की साजिश के चलते उन्हें बदनाम किया जा रहा है, जबकि वर्षों से उनके परिवार इसी पेशे से जुड़े रहे हैं।
‘हम तबला-हारमोनियम वाले हैं, धंधे वाले नहीं’
मुजरा मंडली में तबला बजाने वाले मोहम्मद शाहिद कहते हैं, ‘हमारे दादा-परदादा से लेकर हम तक सब तवायफों के साथ गाते-बजाते आए हैं। लेकिन अब हमें भी वेश्यावृत्ति से जोड़ दिया गया। यह सरासर गलत है।’
उनका सवाल है – ‘जो महिलाएं ठुमरी और सोहर गा सकती हैं, क्या वे अश्लीलता की भाषा समझ सकती हैं?’
सरकार और समाज की दोहरी सोच
सरकारी रिकॉर्ड में ये महिलाएं अब भी ‘कलाकार’ के तौर पर दर्ज हैं, लेकिन व्यवहार में समाज इन्हें न इज्जत देता है, न अपनापन। गांव में मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है, लेकिन गरीब परिवारों की बेटियां ही इस पेशे में आ रही हैं – मजबूरी, गरीबी और परंपरा का त्रिकोण।
कुछ ने अपनी बेटियों को खाड़ी देशों में भेजकर समृद्धि पाई, तो कुछ आज भी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं।
प्रशासन की दखल, लेकिन समाधान अधूरा
दो साल पहले गांव की कई महिलाओं ने खुलेआम वेश्यावृत्ति के खिलाफ आवाज उठाई। यह पहली बार था जब कैमरे के सामने किसी तवायफ ने कहा – ‘हमें इंसान समझा जाए।’
प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और वादा किया कि उन्हें ‘सम्मानजनक’ रोजगार मिलेगा। लेकिन अब तक यह वादा कागजों में ही है।
बसुका – कलंक या करुणा?
बसुका गांव की कहानी एक आईना है – जिसमें समाज की दोगली सोच, प्रशासन की चुप्पी और औरतों की चीखें एक साथ झलकती हैं। यह गांव बदनाम नहीं है, बदनाम किया गया है।
यह गांव अश्लील नहीं है, यहां की चुप्पी अश्लील है।
यह गांव नहीं बदलेगा, जब तक हमारा नजरिया नहीं बदलेगा।
NGV PRAKASH NEWS
(संपूर्ण समाचार सत्य तथ्यों, स्थानीय रिपोर्ट्स और गाजीपुर के क्षेत्रीय संदर्भों पर आधारित है)
