

🛑 त्योहारों पर सड़क सुरक्षा की अनदेखी: नियम सिर्फ आम जनता के लिए? 🛑
विशेष रिपोर्ट — NGV PRAKASH NEWS
भारत में हर साल सैकड़ों लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। सरकार और प्रशासन समय-समय पर सड़क सुरक्षा के लिए अभियान चलाते हैं, बड़े-बड़े पोस्टर लगते हैं, टीवी-रेडियो पर जागरूकता संदेश प्रसारित होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि — क्या त्योहार, जुलूस या राष्ट्रीय पर्व के नाम पर सड़क सुरक्षा के नियमों को तोड़ने की छूट मिल जाती है?
त्योहार बनते हैं सड़क सुरक्षा के लिए ‘ब्लाइंड स्पॉट’
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, धार्मिक शोभायात्राएं या राजनीतिक रैलियां — इन मौकों पर सड़क पर बाइकों का कारवां निकलना आम बात है। लेकिन ये कारवां अक्सर बिना हेलमेट, तीन-तीन सवारियों और तेज रफ्तार के साथ चलते हैं।
सैकड़ों बाइकों पर झंडे लहराते, हूटर बजाते और बीच सड़क स्टंट करते युवा न सिर्फ अपनी बल्कि दूसरों की जान भी जोखिम में डालते हैं। और हैरानी की बात यह है कि पुलिस अक्सर मूकदर्शक बनी रहती है।
प्रशासन और राजनीतिक ‘चुप्पी’
जब यह उल्लंघन आम नागरिक करता है, तो चालान काटने में देर नहीं लगती। लेकिन जैसे ही इसमें सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता या विपक्षी राजनीतिक दल के समर्थक शामिल होते हैं, प्रशासन का रवैया बदल जाता है।
क्यों?
- राजनीतिक दबाव: किसी दल के जुलूस में कार्रवाई करना, वोट बैंक और नेताओं के गुस्से का डर।
- ‘त्योहार का माहौल’ बहाना: पुलिस अक्सर यह कहकर कार्रवाई टाल देती है कि “भीड़ भड़क सकती है” या “त्योहार का माहौल खराब हो सकता है।”
- दोहरा मापदंड: आम जनता से सख्ती, नेताओं और कार्यकर्ताओं से नरमी।
सड़क सुरक्षा कोई मौसमी नियम नहीं
सड़क सुरक्षा का मकसद सिर्फ कानून पालन नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा है। यातायात नियम किसी भी दिन, समय या परिस्थिति के लिए समान रूप से लागू होते हैं।
- बिना हेलमेट चलना → सिर की चोट से मौत का सबसे बड़ा कारण।
- ओवरलोडिंग (तीन सवारी) → संतुलन बिगड़ने और दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ा देता है।
- स्टंट और तेज रफ्तार → भीड़ में टक्कर का खतरा और पैदल चलने वालों की सुरक्षा पर सीधा खतरा।
त्योहार का जश्न मनाना जरूरी है, लेकिन यह जश्न अगर किसी की जिंदगी खत्म कर दे, तो वह खुशी नहीं, त्रासदी बन जाती है।
क्या होना चाहिए?
- त्योहारों और जुलूसों के लिए यातायात की स्पष्ट गाइडलाइन — कितने वाहन, कितनी सवारी और किस रूट पर जाएंगे।
- राजनीतिक दलों पर समान नियम लागू — चाहे सत्ताधारी हो या विपक्ष, सभी के जुलूस में हेलमेट और यातायात पालन अनिवार्य।
- जुलूस से पहले यातायात पुलिस की ब्रीफिंग — मौके पर मौजूद फोर्स को स्पष्ट निर्देश कि उल्लंघन करने पर कार्रवाई होगी।
- सीसीटीवी और वीडियोग्राफी — बाद में पहचान कर चालान और जुर्माना।
- सड़क सुरक्षा को ‘त्योहार का हिस्सा’ बनाना — हेलमेट और सीट बेल्ट पहनकर ही जुलूस में शामिल होने की परंपरा बनानी होगी।
निष्कर्ष:
त्योहार, राष्ट्रीय पर्व या धार्मिक जुलूस हमारे समाज और संस्कृति की पहचान हैं, लेकिन यह जश्न सड़क पर मौत का कारण नहीं बनना चाहिए। यातायात नियमों का पालन सिर्फ आम दिनों में ही नहीं, बल्कि त्योहारों पर और भी सख्ती से होना चाहिए। प्रशासन को राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर, समानता और कानून के राज को लागू करना होगा — क्योंकि सड़क पर जिंदगी किसी भी झंडे, पार्टी या त्योहार से ज्यादा कीमती है।
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