




📢 लखनऊ
उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बड़ा और जनहितकारी फैसला लिया है। अब राज्य में प्रॉपर्टी बंटवारे (Partition Deed) पर लगने वाली स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस की अधिकतम सीमा 5,000 रुपये तय कर दी गई है।
पहले नियम यह था कि प्रॉपर्टी की कुल कीमत के हिसाब से शुल्क देना पड़ता था—यानी 4% स्टाम्प ड्यूटी और 1% रजिस्ट्रेशन फीस। इस कारण अक्सर लोग रजिस्ट्री कराने से कतराते थे, जिससे पारिवारिक विवाद अदालतों तक पहुंच जाते थे।
✨ अब फर्क क्या पड़ेगा?
- चाहे संपत्ति 20 लाख की हो या 20 करोड़ की, अब अधिकतम शुल्क केवल 5,000 रुपये ही लगेगा।
- उदाहरण के लिए:
- पहले 20 लाख की प्रॉपर्टी पर करीब 1 लाख रुपये चुकाने पड़ते थे, अब केवल 5,000 रुपये।
- 1 करोड़ की प्रॉपर्टी पर जहां पहले लगभग 5 लाख रुपये खर्च होते थे, अब वही 5,000 रुपये में निपट जाएगा।
🏠 लोगों को क्या फायदा?
- पारिवारिक बंटवारे में खर्च का बोझ घटेगा।
- रजिस्ट्री बढ़ने से जमीन और मकानों का रिकॉर्ड अपडेट रहेगा।
- आगे चलकर खरीद-बिक्री में पारदर्शिता और सुविधा होगी।
- झगड़े और मुकदमेबाजी कम होंगे।
📊 सरकार पर असर
शुरुआत में सरकार के राजस्व में थोड़ी कमी हो सकती है, लेकिन रजिस्ट्री की संख्या बढ़ने से दीर्घकालिक रूप से आय में बढ़ोतरी होगी।
इस तरह का नियम पहले से ही तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में लागू है और वहां अच्छे नतीजे सामने आए हैं।
👉 स्टाम्प ड्यूटी असल में वह टैक्स है जो किसी प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री, ट्रांसफर या बंटवारे को कानूनी मान्यता देने के लिए लिया जाता है। अब इस बदलाव से यूपी में आम लोगों को बड़ी राहत मिलने वाली है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रॉपर्टी बंटवारे (Partition Deed) से जुड़े नियमों में ऐतिहासिक बदलाव किया है। अब राज्य में किसी भी संपत्ति के बंटवारे पर स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस की अधिकतम सीमा 5,000 रुपये तय कर दी गई है।
पहले तक व्यवस्था यह थी कि बंटवारे के लिए प्रॉपर्टी की कीमत पर 4% स्टाम्प ड्यूटी और 1% रजिस्ट्रेशन फीस देनी पड़ती थी। यानी 20 लाख रुपये की संपत्ति पर 1 लाख और 1 करोड़ की संपत्ति पर लगभग 5 लाख रुपये तक का खर्च आ जाता था। इस वजह से लोग अक्सर रजिस्ट्री कराने से बचते थे और पारिवारिक विवाद कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाते थे।
🏠 आम जनता के लिए सीधी राहत
अब नियम बेहद सरल है—संपत्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो, शुल्क सिर्फ 5,000 रुपये।
- परिवारों को भारी-भरकम फीस के कारण होने वाली देरी और तनाव से छुटकारा मिलेगा।
- पारिवारिक बंटवारे की प्रक्रिया कानूनी रूप से आसान होगी।
- संपत्ति के दस्तावेज अपडेट रहेंगे, जिससे आगे चलकर खरीद-बिक्री में पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ेगी।
⚖️ कानूनी और सामाजिक असर
- विवादों में कमी: पहले अनावश्यक खर्च के डर से लोग मौखिक या निजी समझौते कर लेते थे। इन मामलों में बाद में विवाद खड़े होते थे और मुकदमेबाजी सालों तक चलती थी। नया नियम ऐसे विवादों को काफी हद तक कम करेगा।
- कानूनी सुरक्षा: कम खर्च में रजिस्ट्री होने से लोग संपत्ति के लेन-देन को कानूनी दायरे में लाने के लिए प्रेरित होंगे। इससे धोखाधड़ी और कब्जे जैसे मामलों में कमी आएगी।
- समाज में विश्वास: जब रिकॉर्ड स्पष्ट और पारदर्शी होंगे तो खरीदार और विक्रेता, दोनों को भरोसा रहेगा। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में यह कदम सामाजिक संतुलन बनाने में सहायक होगा।
📊 सरकार की रणनीति और आर्थिक पहलू
यह कदम सिर्फ लोगों को राहत देने के लिए नहीं है, बल्कि सरकार की एक दूरगामी रणनीति भी है।
- शुरुआत में भले ही राजस्व कम होगा, लेकिन रजिस्ट्री की संख्या बढ़ने से लंबे समय में आय में वृद्धि होगी।
- सरकार का मकसद है कि लोग बंटवारे को कानूनी रूप से दर्ज कराएं, जिससे संपत्ति संबंधी आंकड़े राज्य के पास अपडेट रहें।
- जमीन-जायदाद से जुड़े भ्रष्टाचार और अवैध लेन-देन पर भी इस फैसले से रोक लगेगी।
🌍 अन्य राज्यों का अनुभव
तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पहले से ही यह नियम लागू है और वहां इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। परिवारों ने विवादों से राहत पाई, वहीं सरकार को भी अधिक रजिस्ट्री से स्थायी आय मिली। यूपी में भी यही प्रभाव देखने को मिल सकता है।
🔎 निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला केवल एक राजस्व सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और कानूनी सुधार भी है। इससे आम आदमी को सस्ता और आसान रास्ता मिलेगा, न्यायालयों पर बोझ घटेगा और रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी। यह कदम न सिर्फ लोगों को आर्थिक राहत देगा बल्कि आने वाले वर्षों में प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत करेगा।
✍️ विश्लेषण: NGV PRAKASH NEWS
