

NGV PRAKASH NEWS की त्वरित टिप्पणी../ विश्लेषण
बिहार में महागठबंधन की हार: कारणों का विस्तृत विश्लेषण
बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को उम्मीद से कम सफलता मिली। शुरुआती चरणों में तेजस्वी यादव की रैलियों में भारी भीड़ और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर मिले समर्थन ने संकेत दिया था कि मुकाबला कड़ा होगा। लेकिन अंतिम परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि चुनाव के संदेश, रणनीति और प्रबंधन—तीनों में कुछ बड़ी चूकें हुईं, जिनका सीधा असर वोटबैंक पर पड़ा।
सबसे बड़ी चूक विवादित बयानों की रही, जिसने जनता के बीच महागठबंधन की छवि को कमजोर किया। चुनाव के अंतिम दौर में दिए गए उत्तेजक बयानों ने मतदाताओं में असहजता फैलाते हुए एनडीए के नैरेटिव को मजबूत किया। साथ ही, तेजस्वी यादव के नौकरी वाले बड़े वादे, कांग्रेस की सांस्कृतिक असंवेदनशील टिप्पणियाँ और नीतीश सरकार की तुलना में विकास की विश्वसनीयता—इन सबने मिलकर विपक्ष की जमीन कमजोर की।
नीचे महागठबंधन की हार के प्रमुख कारण हाइलाइटेड पॉइंट्स में प्रस्तुत हैं:
👉 1. “कट्टा लेकर घूमेंगे” वाला विवादित बयान
- चुनाव के अंतिम चरण में राष्ट्रीय जनता दल के मंच से एक बच्चे द्वारा दिया गया बयान —
“तेजस्वी भैया आएंगे तो हम कट्टा लेकर घूमेंगे” - इस बयान ने मतदाताओं में “जंगलराज वापसी” की छवि को पुनर्जीवित कर दिया।
- बिहार का मतदाता हिंसा और अराजकता की यादों से बाहर निकल चुका है, इसलिए इस बयान ने भारी नुकसान पहुँचाया।
👉 2. हर घर को सरकारी नौकरी का अवास्तविक वादा
- तेजस्वी यादव ने हर घर से एक सरकारी नौकरी का वादा किया लेकिन इसका आर्थिक आधार नहीं बताया।
- इससे पहले वे एनडीए के एक करोड़ नौकरियों के वादे पर सवाल उठा चुके थे कि पैसा कहाँ से आएगा।
- यह विरोधाभास मतदाताओं की नज़र में उनकी विश्वसनीयता कम कर गया।
👉 3. छठ पूजा पर कांग्रेस की विवादित बयानबाज़ी
- छठ पूजा बिहार की अस्मिता और भावनाओं का प्रतीक है।
- कांग्रेस नेताओं की छठ को लेकर की गई टिप्पणियों ने जनता को नाराज़ किया।
- इस सांस्कृतिक मुद्दे ने ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्र तक महागठबंधन के खिलाफ माहौल बनाया।
👉 4. छठ मनाने लौटे प्रवासी मजदूरों का एनडीए की तरफ झुकाव
- छठ पर बड़ी संख्या में प्रवासी बिहार लौटे और उन्होंने मतदान किया।
- अधिकांश प्रवासी मतदाताओं ने एनडीए को वोट दिया, जिसने कई सीटों पर परिणाम बदले।
- यह फैक्टर 2020 की तरह इस बार भी निर्णायक साबित हुआ।
👉 5. एनडीए के ‘गुंडाराज’ नैरेटिव को काउंटर नहीं कर पाया महागठबंधन
- तेजस्वी यादव अपराध बढ़ने की बात करते रहे, लेकिन वह इसे मजबूत आंकड़ों से साबित नहीं कर सके।
- इसके उलट एनडीए ने स्थिरता और नियंत्रण वाली छवि को जनता के सामने बेहतर तरीके से पेश किया।
👉 6. नीतीश कुमार का सुशासन मॉडल और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास
- पिछले 15 वर्षों में सड़कों, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में व्यापक सुधार हुए।
- मतदाताओं ने इन विकास कार्यों को स्वीकार किया और इन्हें स्थिर शासन का प्रमाण माना।
- लालू-राबड़ी शासनकाल की तुलना ने महागठबंधन के खिलाफ माहौल बनाया।
👉 7. महागठबंधन का संदेश और रणनीति अंतिम दौर में कमजोर पड़ना
- तेजस्वी की रैलियाँ भीड़ खींच रही थीं, लेकिन अंतिम चरणों में नैरेटिव बिखर गया।
- विवादित बयान, अवास्तविक वादे और सांस्कृतिक मुद्दों को गंभीरता से नहीं संभाला गया।
- अंतिम दौर में जनता का रुझान एनडीए के पक्ष में शिफ्ट हो गया।
👉8. कांग्रेस के साथ तेजस्वी को गठबंधन करना भी राष्ट्रीय जनता दल के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ…
कांग्रेस को नकार चुकी बिहार की जनता तेजस्वी को उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन करना नहीं भाया |
कांग्रेस नेता का ऊलजुलूल बयान और अंतिम समय तक दोनों दलों में तालमेल का अभाव भी जनता को उनके पक्ष से दूर हो जाने को मजबूर कर दिया…
निष्कर्ष
इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव महागठबंधन के वोटबैंक पर पड़ा। रणनीति, सांस्कृतिक समझ, विश्वसनीय वादे और नेतृत्व छवि—चारों मोर्चों पर हुई कमियों ने एनडीए को निर्णायक जीत दिलाने में मदद की।
NGV PRAKASH NEWS




